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________________ प्रथम वर्ग कालगए कहिं गए, कहिं उववण्णे ?" एवं खलु गोयमा ! ममं अन्तेवासी तहेव जहा खंदयस्स जाव ["अब्भणुण्णाए समाणे सयमेव पंच महव्वयाइं आरुहेत्ता, तं चेव सव्वं अवसेसियं नेयव्वं, जाव जाली अणगारे"] कालगए उड्ढे चंदिम जाव[सूर-गहगण-नक्खत्त-तारारूवाणं-बहूइं जोयणाई, बहूई जोयणसयाई, बहूई जोयणसहस्साइं, बहूइं जोयणसयसहस्साई, बहूइं जोयणकोडीओ, बहूइंजोयणकोडाकोडीओ उड्डे दूरं उप्पइत्ता सोहम्मीसाणसणंकुमारमाहिंदबंभलंतगमहासुक्कसहस्साराणयपाणयारणच्चुए तिन्नि य अट्ठारसुत्तरे गेवेजविमाणावाससए वीईवइत्ता] विजए महाविमाणे देवत्ताए उववण्णे। "जालिस्स णं भंते ! देवस्स केवइयं कालं ठिई पण्णत्ता ?" "गोयमा ! बत्तीसं सागरोपमाई ठिई पण्णत्ता।" "से णं भंते ! ताओ देवलोयाओ आउक्खएणं, भवक्खएणं, ठिइक्खएणं कहिं गच्छिहिइ, कहिं उववजिहिइ ?" "गोयमा ! महाविदेहे वासे सिज्झिहिइ।" निक्षेप "एवं खलु जम्बू समणेणं जाव संपत्तेणं अणुत्तरोववाइयदसाणं पढमस्स वग्गस्स पढमस्स अज्झयणस्स अयमढे पण्णत्ते।" गौतम स्वामी ने पूछा - "भन्ते ! आपका अन्तेवासी जाली अनगार जो प्रकृति से भद्र था, वह अपना आयुष्य पूर्ण करके कहाँ गया है ? और कहाँ उत्पन हुआ है ?" भगवान् ने उत्तर दिया – गौतम ! मेरा अन्तेवासी जाली अनगार, इत्यादि कथन स्कंदक के समान जानना, यावत् मेरी अनुमति लेकर, स्वयमेव पांच महाव्रतों का आरोपण करके यावत् संलेखना-संथारा करके, समाधि को प्राप्त होकर काल के समय में काल करके ऊपर चन्द्र,सूर्य, ग्रहगण, नक्षत्र और तारा रूप ज्योतिषचक्र से बहुत योजन, बहुत सैकड़ों योजन, बहुत हजारों योजन, बहुत लाखों योजन, बहुत करोड़ों योजन और बहुत कोडाकोडी योजन लांघकर, ऊपर जाकर सौधर्म ईशान सनत्कुमार माहेन्द्र ब्रह्मलोक लान्तक महाशुक्र सहस्रार आनत प्राणत आरण और अच्युत देवलोकों को तथा तीन सौ अठारह नवग्रैवेयक विमानावासों को लांघ कर, विजयनामक महाविमान में देव के रूप में उत्पन्न हुआ है। प्रश्न - "भन्ते ! जालीदेव की वहाँ काल-स्थिति (आयुमर्यादा) कितनी है ?" उत्तर - "गौतम ! उसकी कालस्थिति बत्तीस सागरोपम की है।". प्रश्न - "भन्ते ! उस देवलोक से आयु-क्षय होने पर, भव-क्षय होने पर और स्थिति-क्षय होने पर वह जालीदेव कहाँ जायेगा? कहाँ उत्पन्न होगा?" उत्तर - "गौतम ! वहाँ से च्यवन कर वह महाविदेह वास से सिद्धि प्राप्त करेगा।"
SR No.003449
Book TitleAgam 09 Ang 09 Anuttaropapatik Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Shreechand Surana
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages134
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Principle, & agam_anuttaropapatikdasha
File Size3 MB
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