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________________ तृतीय वर्ग] [२७ अतिरिक्त बहुतसा हिरण्य, सुवर्ण, कांस्य, वस्त्र तथा विपुल धन, कनक यावत् सारभूत धन दिया, जो सात पीढ़ी तक इच्छापूर्वक देने और भोगने केलिये पर्याप्त था। इसी प्रकार अनीयसकुमार ने भी प्रत्येक स्त्री को एक-एक हिरण्य कोटि, एक-एक स्वर्ण कोटि, इत्यादि पूर्वोक्त सभी वस्तुएँ दीं, यावत् एक-एक पेषणकारी दासी तथा बहुत-सा हिरण्य-सुवर्ण आदि विभक्त कर दिया। ऊँचे प्रासादों में अनीयसकुमार बजते हुए मृदंगों के द्वारा पर्याप्त भोगों का उपभोग करता हुआ रहने लगा। उस काल तथा उस समय श्रीवन नामक उद्यान में भगवान् अरिष्टनेमि स्वामी पधारे । यथा-विधि अवग्रह की याचना करके संयम एवं तप से आत्मा को भावित करते हुए विचरने लगे। जनता उनका धर्मोपदेश सुनने के लिये उद्यान में पहुंची और धर्मोपदेश सुन कर अपने-अपने घर वापस चली गई। जनसमूह का कोलाहल सुनकर अनीयसकुमार ने भी भगवान् के निकट जाने का संकल्प किया। वे भगवान् की सेवा में पहुंचे। उन्होंने भी भगवान् का प्रवचन सुना। प्रवचन के प्रभाव से उनके हृदय में वैराग्य उत्पन्न हो गया। अन्त में गौतमकुमार की तरह वे भगवान् के चरणों में दीक्षित हो गये। दीक्षा लेने के अनन्तर उन्होंने सामायिक से लेकर चौदह पूर्वो का अध्ययन किया। बीस वर्ष दीक्षा का पालन किया। अन्त समय में एक मास की संलेखना करके शत्रुजय पर्वत पर सिद्ध गति को प्राप्त किया। ___ सुधर्मा स्वामी कहने लगे-हे जम्बू! इस प्रकार श्रमण भगवान् महावीर स्वामी ने अष्टम अंग अन्तगड के तृतीय वर्ग के प्रथम अध्ययन का अर्थ प्रतिपादन किया था। २-६ अध्ययन इसी प्रकार अनन्तसेन से लेकर शत्रुसेन पर्यन्त अध्ययनों का वर्णन भी जान लेना चाहिये। सब का बत्तीस-बत्तीस श्रेष्ठ कन्याओं के साथ विवाह हुआ था और सब को बत्तीस-बत्तीस पूर्वोक्त वस्तुएं दी गई। बीस वर्ष तक संयम का पालन एवं १४ पूर्वो का अध्ययन किया। अन्त में एक मास की संलेखना द्वारा शत्रुजय पर्वत पर पाँचों ही सिद्धगति को प्राप्त हुए। विवेचन–प्रस्तुत सूत्र में अनीयसकुमार के शेष जीवन का तथा अनन्तसेन आदि पाँच श्रेष्ठि-पुत्रों का वर्णन किया गया है। ____ 'पीइदाणं' का अर्थ है-प्रीतिदान, जो हर्ष होने के कारण दिया जाता है। यहाँ दान का अर्थ है पारितोषिक-प्रेमोपहार । वैसे प्रीतिदान का प्रयोग दहेज अर्थ में विशेष प्रसिद्ध है। वर्तमान में विवाह के अवसर पर कन्यापक्ष की ओर से वरपक्ष को दिया जाने वाला धन और सम्मान दहेज कहा जाता है, किन्तु प्रस्तुत सत्र से पता चलता है यह दहेज विवाह के अवसर पर वर के पिता की ओर से वर को दिया जाता था। जो वर द्वारा विवाहित कन्याओं में बांट दिया जाता था। 'नवरं सामाइयमाइयाइं चउद्दस पुव्वाई'-इस वाक्य में पठित 'नवरं' यह अव्यय पद गौतमकुमार और अनीयसकुमार की अध्ययनगत भिन्नता को प्रकट कर रहा है। 'नवरं' शब्द का अर्थ है "इतना विशेष है या इतना अन्तर है।" अनीयसकुमार और गौतमकुमार के अध्ययन में जो अन्तर है उसे सूत्रकार ने सामाइय....... पुव्वाइं इन पदों द्वारा व्यक्त कर दिया है। भाव यह है कि गौतमकुमार ने तो केवल ग्यारह अंगों का अध्ययन किया था परंतु अनीयसकुमार ने ११ अंग भी पढ़े और साथ ही १४ पूर्वो का अध्ययन भी किया। १४ पूर्व-तीर्थ का प्रवर्तन करते समय तीर्थंकर भगवान् जिस अर्थ का गणधरों को पहले पहल
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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