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________________ १६] [ अन्तकृद्दशा है, अपरिचित स्थान पर एक या दो रातें ठहर जाता है, वह (१) याचनी - आहार की याचना करना, (२) पृच्छनी - मार्ग पूछना, (३) अनुज्ञापनी स्थान आदि के लिये आज्ञा लेना, (४) प्रश्नों का उत्तर देना, ये चार भाषाएं बोलता है। वह (१) अधः आरामगृह - - जिसके चारों ओर बाग हो, (२) अधोविकटगृहचारों ओर से खुला हो, ऊपर से ढका हो (३) अधो वृक्ष का मूल या वहाँ पर बना स्थान, इन स्थानों पर स्वामी की आज्ञा लेकर ठहर सकता है। इन स्थानों में कोई आग लगा दे तो, यह मुनि जीवन की सुरक्षा के लिये स्वयं स्थान से बाहर नहीं निकलता । विहार में यदि पांव में कांटा लग जाए तो उसे नहीं निकालता, आंखों में धूल पड़ जाए तो उसको भी दूर नहीं करता । जहाँ सूर्य अस्त हो जाए वहीं ठहर जाता है | शरीरशुद्धि को छोड़कर जल का प्रयोग नहीं करता । विहार के समय यदि सामने कोई हिंसक जीव आए तो डरकर पीछे नहीं हटता । यदि कोई जीव उसे देखकर डरता हो तो वह एक ओर हो जाता है। शीत -निवारण के लिये गरम स्थानों या वस्त्रों किंवा तथारूप वस्तुओं का सेवन नहीं करता । गरमी का परिहार करने के लिये शीत स्थान में नहीं जाता। इस विधि से मासिकी प्रतिमा का पालन होता है। इसका समय एक मास का है। इस प्रकार साधु के अभिग्रह विशेष का नाम भिक्षु प्रतिमा है । पहली मासिकी, दूसरी द्वैमासिकी, तीसरी त्रैमासिकी, चौथी चातुर्मासिकी, पांचवीं पाञ्चमासिकी, छठी षाण्मासिकी और सातवीं साप्तमासिकी कहलाती हैं। पहली प्रतिमा में अन्न-पानी की एक दत्ति, दूसरी में दो, तीसरी में तीन, चौथी में चार, पांचवीं में पांच, छट्ठी में छह, सातवीं में सात दत्तियां ली जाती हैं। आठवीं प्रतिमा का समये सात दिन-रात है। नवमी का समय भी सात दिन-रात है। आठवीं में चौविहार उपवास करना होता है। नवमी में चौविहार बेले-बेले पारणा करना होता है । समय सात दिवस का है। दसवीं का समय भी सात दिन-रात का होता है। इसमें चौविहार तेले-तेले पारणा करना होता है। ग्यारहवीं प्रतिमा का समय एक अहोरात्र है । बारहवीं प्रतिमा केवल एक रात्रि की है। इसका आराधन चौविहार तेले से होता है । इन सभी प्रतिमाओं का आराधन श्री गौतममुनिजी ने किया था । - 'गुणरयणं पितवोकम्मं' का अर्थ है – गुणरत्न तपः कर्म । तपों के नाना प्रकारों में गुणरत्न भी एक प्रकार का तप है। इसे 'गुण - रत्न - संवत्सर तप' भी कहते हैं। यह तप सोलह महीनों में सम्पन्न होता है। जिस तप में गुण रूप रत्नों वाला सम्पूर्ण वर्ष बिताया जाये वह तप" गुण-रत्न संवत्सर" तप कहलाता है । इस तप में सोलह मास लगते हैं । जिसमें से ४०७ दिन तपस्या के और ७३ दिन पारणा के होते हैं । यथा— पण्णरस वीस चउव्वीस चेव चउव्वीस पण्णवीसा य । चउव्वीस एक्कवीसा, चउवीसा सत्तवीसा य ॥१ ॥ तीसा तेतीसा वि य चउव्वीस छव्वीस अट्ठवीसा य । तीस वत्तीसा विय सोलसमासेसु तवदिवसा ॥२॥ पण्णरस दसट्ठ छ पंच चउर पंचसु य तिण्णि तिण्णि त्ति । पंचसु दो दो य तहा सोलसमासेसु पारणगा ॥३॥ अर्थात् - पहले मास में पन्द्रह, दूसरे मास में बीस, तीसरे मास में चौबीस, चौथे मास में चौबीस, पांचवें मास में पच्चीस, छट्ठे मास में चौबीस, सातवें मास में इक्कीस, आठवें मास में चौबीस, नौवें मास में सत्ताईस, दसवें मास में तीस, ग्यारहवें मास में तेतीस, बारहवें मास में चौबीस, तेरहवें मास में छब्बीस, चौदहवें मास में अट्ठाईस, पन्द्रहवें मास में तीस और सोलहवें मास में बत्तीस दिन तपस्या के होते हैं । ये सब मिलाकर ४०७ दिन तपस्या के होते हैं । पारणा के दिन इस प्रकार हैं - पहले मास में पन्द्रह, दूसरे मास में दस, तीसरे मास में आठ, चौथे मास में छह, पांचवें मास में पांच, छट्ठे मास में चार, सातवें मास में तीन, आठवें मास में तीन, नौवें मास में तीन, दसवें मास में तीन,
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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