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________________ ७६] [अन्तकृद्दशा सोमिल ब्राह्मण द्वारा की जाने वाली इस कल्पनातीत असह्य महावेदना के बाद भी मुनि गजसुकुमाल की क्या स्थिति रही, इसका हृदय-स्पर्शी वर्णन करते हुए सूत्रकार कहते हैंगजसुकुमाल मुनि की सिद्धि २३–तए णं तस्स गयसुकुमालस्स अणगारस्स सरीरयंसि वेयणा पाउब्भूया-उजला जाव [विउला कक्खडा पगाढा चंडा रुद्दा दुक्खा] दुरहियासा। तए णं से गयसुकुमाले अणगारे सोमिलस्स माहणस्स मणसा वि अप्पदुस्समाणे तं उज्जलं जाव [विउलं कक्खडं पगाढं चंडं रुदं दुक्खं दुरहियासं वेयणं] अहियासेइ। तए णं तस्स गयसुकुमारस्स अणगारस्स तं उज्जलं जाव अहियासेमाणस्स सुभेणं परिणामेणं, पसत्थज्झवसाणेणं, तदावरणिज्जाणं कम्माणं खएणं कम्मरयविकिरणकरं अपुव्वकरणं अणुप्पविट्ठस्स अणंते अणुत्तरे जाव [निव्वाघाए निरावरणे कसिणे पडिपुण्णे ] केवलवरणाणदंसणे समुप्पण्णे। तओ पच्छा सिद्धे जाव [बुद्धे मुत्ते अंतयडे परिनिव्वुए सव्वदुक्ख] प्पहीणे।। तत्थ णं अहासंनिहिएहिं देवेहिं सम्मं आराहिए त्ति कटु दिव्वे सुरभिगंधोद्रए वुढे; दसद्धवण्णे कुसुमे निवाडिए; चेलुक्खेवे कए; दिव्वे य गीयगंधव्वणिणाए कए यावि होत्था। सिर पर उन जाज्वल्यमान अंगारों के रखे जाने से गजसुकुमाल मुनि के शरीर में महा भयंकर वेदना उत्पन्न हुई जो अत्यन्त दाहक, दुःखपूर्ण [अत्यधिक हृदयविदारक, अत्यधिक भयंकर, उग्र, तीव्र, भीषण और दुस्सह] थी। इतना होने पर भी गजसुकुमाल मुनि सोमिल ब्राह्मण पर मन से भी, लेश मात्र भी द्वेष नहीं करते हुए उस एकान्त दुःखरूप [हृदय-विदारक, भयंकर, उग्र, तीव्र, भीषण, दुस्सह] वेदना को समभावपूर्वक सहन करने लगे। उस समय उस एकान्त दुःखपूर्ण दुःसह दाहक वेदना को समभाव से सहन करते हुए शुभ परिणामों तथा प्रशस्त शुभ अध्यवसायों (भावनाओं) के फलस्वरूप आत्मगुणों को आच्छादित करने वाले कर्मों के क्षय से समस्त कर्म-रज को झाड़कर साफ कर देने वाले, कर्म-विनाशक अपूर्वकरण में प्रविष्ट हुए। उन गजसुकुमाल अनगार को अनंत-अंतरहित अनुत्तर-सर्वश्रेष्ठ [निर्व्याघात निरावरण संपूर्ण एवं परिपूर्ण] केवलज्ञान एवं केवलदर्शन की उपलब्धि हुई। तत्पश्चात् आयुष्य पूर्ण हो जाने पर वे सिद्धकृतकृत्य, [बुद्ध-सकलपदार्थों के ज्ञाता, मुक्त-सकल कर्मों] और सर्व प्रकार के दुःखों से रहित हो गये। उस समय वहाँ समीपवर्ती देवों ने "अहो! इन गजसुकुमाल मुनि ने श्रमणधर्म की अत्यन्त उत्कृष्ट आराधना की है" यह जान कर अपनी वैक्रिय शक्ति के द्वारा दिव्य सुगन्धित अचित्त जल की तथ पांच वर्गों के दिव्य अचित्त फूलों एवं वस्त्रों की वर्षा की और दिव्य मधुर गीतों तथा गन्धर्ववाद्ययन्त्रों की ध्वनि से आकाश को गुंजा दिया। विवेचन–परम आत्मस्थ, आत्म-समाधि में लीन मुनि गजसुकुमाल ने सोमिल-ब्राह्मण द्वारा की गई यह भीषणातिभीषण हृदयविदारक महावेदना पूर्ण समभावपूर्वक निद्वेष भाव से सहन की। परिणामतः केवलज्ञान और केवलदर्शन को प्राप्त कर वे मोक्ष में पधार गये। मोक्ष-प्राप्ति में परम सहयोगी रूप (१) शुभ परिणाम और (२) प्रशस्त अध्यवसाय इन दो पदों का "सुभेण परिणामेणं पसत्थज्झवसाणेणं" शब्दों से सूत्र में उल्लेख किया है। दोनों का अर्थ-विभेद इस प्रकार - १. सामान्य रूप से शुभ निष्पाप विचारों को शुभ परिणाम कहते हैं। २. विशेष रूप से आत्म-समाधि में लग जाने या गंभीर आत्मचिन्तन में संलग्न होने की दशा को प्रशस्त अध्यवसाय कहा
SR No.003448
Book TitleAgam 08 Ang 08 Anantkrut Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Divyaprabhashreeji, Devendramuni, Ratanmuni, Kanhaiyalal Maharaj
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1981
Total Pages249
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, & agam_antkrutdasha
File Size16 MB
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