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________________ [ उपासकदशांगसूत्र सकडालपुत्र का प्रमुख व्यवसाय मिट्टी के बर्तन तैयार कराना और बेचना था । पोलासपुर नगर के बाहर उसकी पांच सौ कर्मशालाएं थीं, जहां अनेक वैतनिक कर्मचारी काम करते थे । प्रातः काल होते ही वे वहां आ जाते और अनेक प्रकार के छोटे-बड़े बर्तन बनाने में लग जाते। बर्तनों की बिक्री की दूसरी व्यवस्था थी। सकडालपुत्र ने अनेक ऐसे व्यक्ति वेतन पर नियुक्त कर रखे थे, जो नगर के राजमार्गों, चौराहों, मैदानों तथा सार्वजनिक स्थानों में बर्तनों की बिक्री करते थे । १५० ] सकडालपुत्र की पत्नी का नाम अग्निमित्रा था । वह गृहकार्य में सुयोग्य तथा अपने पति के सुखदुःख में सहभागिन थी । सकडालपुत्र अपने धार्मिक सिद्धान्तों के प्रति अत्यन्त निष्ठावान् था, तदनुसार धर्मोपासना में भी अपना समय लगाता था । [ वह युग ही कुछ ऐसा था, जो व्यक्ति जिन विचारों में आस्था रखता, तदनुसार जीवन में साधना भी करता । आस्था केवल कहने की नहीं होती ।] एक दिन की घटना है, सकडालपुत्र दोपहर के समय अपनी अशोकवाटिका में गया और वहां अपनी मान्यता के अनुसार धर्माराधना में निरत हो गया। थोड़ी ही देर बाद एक देव वहां प्रकट हुआ। सकडालपुत्र के सामने अन्तरिक्ष- स्थित देव ने उसे सम्बोधित कर कहा- कल प्रातः यहां महामाहन, अप्रतिहत ज्ञान-दर्शन के धारक, त्रैलोक्यपूजित, अर्हत्, जिन, केवली, सर्वज्ञ, सर्वदर्शी आएंगे। तुम उनकी वंदना-पर्युपासना करना और उन्हें स्थान, पाट, बाजोट आदि हेतु आमन्त्रित करना । देव यों कहकर चला गया। सकडालपुत्र ने सोचा- देव ने बड़ी अच्छी सूचना की । मेरे धर्माचार्य मंखलिपुत्र गोशालक कल यहां आएंगे। वे ही तो जिन, अर्हत् और केवली हैं, इसलिए मैं अवश्य ही उनकी वन्दना एवं पर्युपासना करूंगा । उनके उपयोग की वस्तुओं हेतु उन्हें आमन्त्रित करूंगा । दूसरे दिन प्रात:काल भगवान् महावीर वहां पधारे। सहस्त्राम्रवन उद्यान में टिके । अनेक श्रद्धालु जन उनके दर्शन हेतु गए। सकडालपुत्र भी यह सोच कर कि उसके आचार्य गोशालक पधारे हैं, दर्शन हेतु गया। भगवान् महावीर का धर्मोपदेश हुआ । अन्य लोगों के साथ सकडालपुत्र ने भी सुना । भगवान् जानते थे कि सकडालपुत्र सुलभवोधि है । उसे सद्धर्म की प्रेरणा देनी चाहिए । अतः उन्होंने उसे सम्बोधित कर कहा -- कल दोपहर में अशोकवाटिका में देव ने तुम्हें जिसके आगमन की सूचना की थी, वहां देव का अभिप्राय गोशालक से नहीं था । सकडालपुत्र भगवान् के अपरोक्ष ज्ञान से प्रभावित हुआ और मन प्रसन्न हुआ। वह उठा, भगवान् को विधिवत् वन्दन किया और अपनी कर्मशालाओं में पधारने तथा अपेक्षित सामग्री ग्रहण की प्रार्थना की। भगवान् ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और वहां पधारे । सकडालपुत्र भगवान् महावीर के व्यक्तित्व और उनके अतीन्द्रिय ज्ञान प्रभावित तो था, पर उसकी सैद्धान्तिक आस्था मंखलिपुत्र गोशालाक में थी, यह भगवान् जानते थे । भगवान् अनुकूल अवसर देख उसे सद्द्बोध देना चाहते थे । एक दिन की बात है, सकडालपुत्र अपनी कर्मशाला के भीतर हवा लगने हेतु रखे हुए बर्तनों को धूप में देने के लिए बाहर रखवा रहा था । भगवान् को यह अवसर
SR No.003447
Book TitleAgam 07 Ang 07 Upashak Dashang Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Kanhaiyalal Maharaj, Trilokmuni, Devendramuni, Ratanmuni
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1989
Total Pages276
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Conduct, & agam_upasakdasha
File Size19 MB
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