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________________ उपाध्याय जैसे गौरवपूर्ण पद को धारण कर सकता है क्योंकि स्थानांग और समवयांग में उन सभी विषयों की संक्षेप में चर्चाएँ आ गयी हैं, आचार्य व उपाध्याय पद के लिए जिनका जानना अत्यधिक आवश्यक हैं। २२८ संक्षेप में यों कहा जा सकता है कि जिनवाणी रूपी विरट् सागर को समवायांग रूपी गागर में भर दिया गया है। यही कारण है कि अन्य आगम साहित्य में इस की स्पष्ट प्रतिध्वनि सुनाई देती है अतः हम यहां पर बहुत ही संक्षेप में अन्य आगमों के आलोक में समवायांगगत विषयों की तुलना कर रहे हैं। 1 समवायांग और आचारांग जिनवाणी के जिज्ञासुओं के लिए आचारांग का सर्वाधिक महत्त्व है। वह सबसे प्रथम अंग है - रचना की दृष्टि से और स्थापना की दृष्टि से भी । आचारांग रचनाशैली, भाषाशैली व विषयवस्तु की दृष्टि से अद्भुत है । आचार और दर्शन दोनों ही दृष्टि से उसका महत्त्व है। हम समवायांग की आचारांग के साथ संक्षेप में तुलना कर रहे हैं। समवायांग के प्रथम समवाय का तृतीय सूत्र है- एगे दण्डे, आचारांग २२९ में भी इसका उल्लेख है। समवायांग के पाँचवें समवाय का द्वितीय सूत्र पंच महव्वया पण्णत्ता.......' है तो आचारांग २३० में भी यह निरूपण है। - समवायांग के पाँचवें समवाय का तृतीय सूत्र – 'पंच कामगुणा पण्णत्ता......' है तो आचारांग २३१ में भी इसका प्रतिपादन हुआ है 1 समवायांग के पाँचवें समवाय में छट्टा सूत्र – 'पंच निजराणा पण्णत्ता.....' है तो आचारांग २२२ में भी यह वर्णन प्राप्त है। समवायांग के छुट्टे समवाय का द्वितीय सूत्र छ जीवनिकाय पण्णत्ता....' है तो आचारांग २३३ में भी इसका निरूपण है। समवायांग के सातवें समवाय का तृतीय सूत्र - 'समणे भगवं महावीरे सत्तरयणीओ उड्ढं उच्चतेणं होत्था.....' है तो आचारांग २३४ में भी महावीर की अवगाहना का यही वर्णन है । है तो समवायांग के नवम समवाय का तृतीय सूत्र – 'नव बंभचेरा पण्णत्ता... आचारांग २३५ में भी ब्रह्मचर्य का वर्णन प्राप्त है। समवायांग के पच्चीसवें समवाय का पहला सूत्र - " पुरिम- पच्छिमगाणं तित्थगराणं पंच-जामस्स पणवीसं भावणाओ पण्णत्ताओ........" है तो आचारांग २३६ में भी पांच महाव्रतों की पच्चीस भावनाओं का उल्लेख हुआ है। समवायांग के तीसवें समवाय में "समणे भगवं महावीरे तीसं वासाई आगारवासमज्झे वसित्ता आगाराओ अपगारियं पव्वइए.. " है तो आचारांग २३७ में भी भगवान् महावीर की दीक्षा का यही वर्णन है। २२८. ठाण समवायधरे कप्पर आयरिषत्ताए उवज्झायत्ताए गणावच्छेइयत्ताए उद्दिसित्ताए । व्यवहारसूत्र उद्देशक ३ २२९. २३१. २३३. २३५. २३६. २३७. आचारांग श्रु. १ अ. १ उ. ४ आचारांग श्रु. १ अ. २ उ. १ सू. ६५ आचारांग श्रु. १ अ. १९ उ. १ से ७ आचारांग . १ अ. १ से ९ आचारांग . २ चु. ३ सू. १७९ आचारांग . २ चु. ३ सू. १७९ २३०. आचारांग श्रु. ३ सू. १७९ २३२. आचारांग . ३ सू. १७९ २३४. आचारांग श्रु. २ अ. १५ उ. १ सू. १६६ [ ५५ ]
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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