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________________ ४६] [समवायाङ्गसूत्र पन्द्रह परम अधार्मिक देव कहे गये हैं अम्ब १, अम्बरिषी २, श्याम ३, शबल ४, रुद्र ५, उपरुद्र ६, काल ७, महाकाल ८, असिपत्र ९, धनु १०, कुम्भ ११, वालुका १२, वैतरणी १३, खरस्वर १४, महाघोष १५ ॥१-२॥ विवेचन-यद्यपि ये अम्ब आदि पन्द्रह असुरकुमार जाति के भवनवासी देव हैं, तथापि ये पूर्व 'भव के संस्कार से अत्यन्त क्रूर संक्लेश परिणामी होते हैं और इन्हें नारकों को लड़ाने-भिड़ाने और मारकाट करने में ही आनन्द आता है, इसलिये ये परम-अधार्मिक कहलाते हैं। इनमें जो नारकों को खींच कर उनके स्थान से नीचे गिराता है और बाँधकर खुले अम्बर (आकाश) में छोड़ देता है, उसे अम्ब कहते हैं। अम्बरिषी असुर उस नारक को गंडासों से काट-काट कर भाड़ में पकाने के योग्य टुकड़े-टुकड़े करते हैं। श्याम असुर कोड़ों से तथा हाथ के प्रहार आदि से नारकों को मारते-पीटते हैं । शबल असुर चीर-फाड़ कर नारकियों के शरीर से आंते, चर्बी, हृदय आदि निकालते हैं। रुद्र और उपरुद्र असुर भाले बर्छ आदि से छेद कर ऊपर लटकाते हैं। काल असुर नारकों को कण्डु आदि में पकाते हैं। महाकाल उनके पके मांस को टुकड़े-टुकड़े करके खाते हैं। असिपत्र असुर सेमल वृक्ष का रूप धारण कर अपने नीचे छाया के निमित्त से आने वाले नारकों को तलवार की धार के समान तीक्ष्ण पत्ते गिरा कर उन्हें कष्ट देते हैं । धनु असुर धनुष द्वारा छोड़े गये तीक्ष्ण नोक वाले वाणों से नारकियों के अंगों का छेदन-भेदन करते हैं । कुंभ उन्हें कुंभ आदि में पकाते हैं । वालुका जाति के असुर वालु के आकार कदम्प पुष्प के आकार और वज्र के आकार रूप से अपने शरीर की विक्रिया करके उष्ण वालु में गर्म भाड़ में चने के समान नारकों को भूनते हैं। वैतरणी नामक असुर पीव, रक्त आदि से भरी हुई तप्त जल वाली नदी का रूप धारण करके प्यास से पीड़ित होकर पानी पीने को आने वाले नारकों को अपने विक्रिया वाले क्षार उष्ण जल से पीड़ा पहुँचाते हैं और उनको उसमें डुबकियाँ लगवाते हैं। खरस्वर वाले असुर वज्रमय कंटकाकीर्ण सेमल वृक्ष पर नारकों को बार-बार चढ़ाते-उतारते हैं। महाघोष असुर भय से भागते हुए नारकियों को बाड़ों में घेर कर उन्हें नाना प्रकार की यातनाएं देते हैं । इस प्रकार ये कूर देव तीसरी पृथिवी तक जा करके वहाँ के नारकों को भयानक कष्ट देते हैं। १०२–णमी णं अरहा पन्नरस धणूई उड्ढे उच्चत्तेणं होत्था। नमि अर्हन् पन्द्रह धनुष ऊंचे थे। १०३–धुवराहू णं बहुलपक्खस्स पडिवए पन्नरसभागं पन्नरस भागेणं चंदस्सलेसं आवरेत्ताण चिट्ठति, तं जहा-पढमाए पढमं भागं, बीआए दुभागं, तइआए तिभागं, चउत्थीए चउभाग, पंचमीए पंचभागं, छट्ठीए छभागं, सत्तमीए सत्तभागं, अट्ठमीए अट्ठभागं, नवमीए नवभाग, दसमीए दसभागं, एक्कारसीए एक्कारसभागं, बारसीए बारसभागं, तेरसीए तेरसभागं, चउद्दसीए चउद्दसभागं, पन्नरसेसु पनरसभागं, [आवरेत्ताण चिट्ठति ] तं चेव सुक्कपक्खस्स य उवदंसेमाणे उवदंसेमणे चिट्ठति,तं जहा-पढमाए पढमभागंजाव पन्नरसेसु पनरसभागं उवदंसेमाणे उवदंसेमाणे चिट्ठति। धुव्रराहु कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के दिन से चन्द्र लेश्या के पन्द्रहवें-पन्द्रहवें दीप्तिरूप भाग को
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
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