SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 139
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २०] [समवायाङ्गसूत्र अष्टस्थानक-समवाय ४४-अट्ठमयट्ठाणा पण्णत्ता, तं जहा-जातिमए कुलमए बलमए रूवमए तवमए सुयमए लाभमए इस्सरियमए। अट्ट पवयणमायाओ पण्णत्ताओ, तं जहा-ईरियासमिई भासासमिई एसणासमिई आयाणभंडमत्तणिक्खेवणासमिई उच्चार-पासवण-खेल-जल्ल-सिंघाणपारिट्ठावणियासमिई मणगुत्ती वयगुत्ती कायगुत्ती। __ आठ मदस्थान कहे गये हैं, जैसे-जातिमद (माता के पक्ष की श्रेष्ठता का अहंकार), कुलमद (पिता के वंश की श्रेष्ठता का अहंकार), बलमद, रूपमद, तपोमद, श्रुतमद (विद्या का अहंकार) लाभमद और ऐश्वर्यमद (प्रभुता का अभिमान) ।आठ प्रवचन-माताएं कही गई हैं, जैसे-ईर्यासमिति, भाषासमिति, एषणासमिति, आदान-भांड-मात्र निक्षेपणासमिति, उच्चार-प्रस्त्रवण-खेल जल्ल सिंघाण-परिष्ठापनासमिति, मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति। विवेचन- मनुष्य जिन स्थानों या कारणों से अहंकार या अभिमान करता है उनको मदस्थान कहा जाता है। वे आठ हैं । विभिन्न कलाओं की प्रवीणता या कुशलता का मद भी होता है, उसे श्रुतमद के अन्तर्गत जानना चाहिए। प्रवचन का अर्थ द्वादशाङ्ग गणिपिटक और उसका आधारभूत संघ है। जैसे माता बालक की रक्षा करती है, उसी प्रकार पांच समितियां और तीन गुप्तियां द्वादशाङ्ग प्रवचन की और संघ की, संघ के संयमरूप धर्म की रक्षा करती हैं, इसलिए उनको प्रवचनमाता कहा जाता है। ४५-वाणमंतराणं देवाणं चेइयरुक्खा अट्ट जोयणाई उड्ढं उच्चत्तेणं पण्णत्ता। जंबू णं सुदंसणा अट्ठ जोयणाई उड्ढ उच्चत्तेणं पण्णत्ता। कूडसामली णं गरुलावासे अट्ठ जोयणाई उड्ढं उच्चत्तेणं पण्णत्ते। जंबुद्दीवस्स णं जगई अट्ठ जोयणाइं उड्ढे उच्चत्तेणं पण्णत्ता। वानव्यन्तर देवों के चैत्यवृक्ष आठ योजन ऊंचे कहे गये हैं। (उत्तरकुरु में स्थित (पार्थिव) जंबू नामक सुदर्शन वृक्ष आठ योजन ऊंचा कहा गया है। (देवकुरु में स्थित) गरुड का आवासभूत पार्थिव कूटशाल्मली वृक्ष ॐउ योजन ऊंचा कहा गया है। जम्बूद्वीप की जगती (प्राकार के समान पाली) आठ योजन ऊंची कही गई है। ४६ -अट्ठसामइए केवलिसमुग्घाए पण्णत्ते, तं जहा-पढमे समए दंडं करेइ, बीए समए कवाडं करेइ, तइयसमए मंथं करेइ, चउत्थे समए मंथंतराइं पूरेइ, पंचमे समए मंथंतराई पडिसाहरइ, छठे समए मंथं पडिसाहरइ। सत्तमे समए कवाडं पडिसाहरइ, अट्ठमे समए दंडं पडिसाहरइ। ततो पच्छा सरीरत्थे भवइ। __ केवलिसमुद्घात आठ समय वाला कहा गया है। जैसे- केवली भगवान् प्रथम समय में दंड समुद्घात करते हैं, दूसरे मसय में कपाट समुद्घात करते हैं, तीसरे समय में में मन्थान समुद्घात करते हैं, चौथे समय में मन्थान के अन्तरालों को पूरते हैं, अर्थात् लोकपूरण समुद्घात करते हैं, पांचवें समय में मन्थान के अन्तराल से आत्मप्रदेशों का प्रतिसंहार (संकोच) करते हैं. छठे समय में मन्थान प्रतिसंहार करते हैं, सातवें समय में कपाट समुद्घात का प्रतिसंहार करते हैं और आठवें समय में दंडसमुद्घात का प्रतिसंहार करते हैं। तत्पश्चात् उनके आत्मप्रदेश शरीरप्रमाण हो जाते हैं। ४७-पासस्स णं अरहओ पुरिसादाणिअस्स अट्ठ गणा अट्ठ गणहरा होत्था, तं जहा
SR No.003441
Book TitleAgam 04 Ang 04 Samvayanga Sutra Stahanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMadhukarmuni, Hiralal Shastri
PublisherAgam Prakashan Samiti
Publication Year1991
Total Pages379
LanguagePrakrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari, Agam, Canon, Metaphysics, & agam_samvayang
File Size24 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy