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द्वादशाङ्ग गणिपिटक
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१८२ १८३ १८५ १८८
द्वादशांग-नाम
१६८ उपासकदशा आचारांग
१६८ अन्तकृद्दशा सूत्रकृत-अंग
१७० अनुत्तरौपपातिकदशा स्थानांग
१७३ प्रश्नव्याकरण समवायांग .
१७४ . विपाकश्रुत व्याख्याप्रज्ञप्ति
१७५ दृष्टिवाद ज्ञाताधर्मकथा
१७६ गणिपिटक की विराधनाआराधना का फल गणिपिटक की नित्यता विविधविषय निरूपण
राशि- पर्याप्तापर्याप्त - आवास-स्थिति- शरीर-अवधि-वेदना-लेश्या- आहारआयुबन्ध-उत्पाद-उद्वर्तनाविरह-आकर्ष-संहनन-संस्थान-वेद-समवसरण-कुलकरतीर्थंकर-चक्रवर्ती-बलदेव-वासुदेव-ऐरवततीर्थंकर-भावी तीर्थंकर-भावी-चक्रवर्ती भावी बलदेव-वासुदेव- ऐरवत क्षेत्र के भावी तीर्थंकर - चक्रवर्ती बल्देव-वासुदेव ।
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