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________________ छठा अध्याय ५७ -पहला जीवरूप अधिकरण क्रमश: सरम्भ, समारम्भ, आरम्भ भेद से तीन प्रकार का, योगभेद से तीन प्रकार का, कृत, कारित, अनुमतभेद से तीन प्रकार का और कषाय के भेद से चार प्रकार का है। १० – पर अर्थात् अजीवाधिकरण निर्वर्तना, निक्षेप, संयोग और निसर्गरूप है; जो क्रमशः दो, चार, दो और तीन भेद वाला है। ११ - ज्ञान और दर्शन के प्रदोष, निह्नव मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात – ये ज्ञानावरण-कर्म तथा दर्शनावरण कर्म के बन्ध - हेतु आश्रव हैं। , १२ – निज आत्मा में, पर आत्मा में या दोनों में, विद्यमान दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन, ये असातवेदनीय कर्म के बन्ध हेतु हैं। दान, १३- भूत- अनुकम्पा, व्रति अनुकम्पा, सरागसंयमादि योग, शान्ति और शौच में सातवेदनीय कर्म के बन्ध हेतु हैं। १४ - केवलज्ञानी, श्रुत, संघ, धर्म और देव का अवर्णवाद दर्शनमोहनीय कर्म का बन्ध हेतु है। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003426
Book TitleTattvartha Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAkhileshmuni
PublisherSanmati Gyan Pith Agra
Publication Year2001
Total Pages102
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari, Tattvartha Sutra, Tattvartha Sutra, & Tattvarth
File Size2 MB
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