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________________ ७० संकड़ी गली जिसको लोकैषणा नहीं है, उसे अन्य चिन्ताएं और पाप-प्रवृत्तियाँ भी नहीं है । वस्तुतः जब मन लोकैषणा में रमता है, तब आत्मा की एषणा नहीं हो सकती। राम और रावण की तरह भोग और योग,त्याग और काम एक साथ नहीं रह पाते । कबीर की भाषा में प्रेम गली अति सांकड़ी तामै दो न समाय । इस संकड़ी गली में त्याग और भोग साथ-साथ कैसे रह सकते हैं ? एक बादशाह ने फकीर से पूछा- 'कभी आप मुझे भी याद करते हैं ? फकीर ने जबाब दिया-'हाँ, हाँ, क्यों नहीं ?' बादशाह ने खुश होकर पूछा-'भला किस वक्त ?' फकीर ने निर्भयता के साथ कहा-'जब भगवान को भूल जाता हूं, तब आपकी याद आ जाती है।' वास्तव में जब साधक भगवान को, अर्थात् अपने को भूल जाता है, तभी वह दूसरों को याद करता है। Jain Education InternationaFor Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003199
Book TitlePratidhwani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorDevendramuni
PublisherTarak Guru Jain Granthalay
Publication Year1971
Total Pages228
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size6 MB
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