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________________ आध्यात्मिक पूजन - विधान संग्रह जिसके शृंगारों में मेरा यह, मंहगा जीवन घुल जाता । अत्यन्त अशुचि जड़ काया से, इस चेतन का कैसा नाता || दिन-रात शुभाशुभ भावों से, मेरा व्यापार चला करता । मानस वाणी और काया से, आस्रव का द्वार खुला रहता ॥ शुभ और अशुभ की ज्वाला से, झुलसा है मेरा अन्तस्तल । शीतल समकित किरणें फूटें, संवर से जागे अन्तर्बल ॥ फिर तप की शोधक बह्नि जगे, कर्मों की कड़ियाँ टूट पड़ें। सर्वांग निजात्म प्रदेशों से, अमृत के झरने फूट पड़ें ॥ हम छोड़ चलें यह लोक तभी, लोकान्त विराजें क्षण में जा । निजलोक हमारा वासा हो, शोकान्त बनें फिर हमको क्या ।। जागे मम दुर्लभ बोधि प्रभु ! दुर्नयतम सत्वर टल जावे । बस ज्ञाता दृष्टा रह जाऊँ, मद-मत्सर मोह विनश जावे ॥ चिर रक्षक धर्म हमारा हो, हो धर्म हमारा चिर साथी । जग में न हमारा कोई था, हम भी न रहें जग के साथी ॥ (देव - स्तवन) 213 चरणों में आया हूँ प्रभुवर ! शीतलता मुझको मिल जावे । मुरझाई ज्ञानलता मेरी, निज अन्तर्बल से खिल जावे ।। सोचा करता हूँ भोगों से, बुझ जावेगी इच्छा - ज्वाला । परिणाम निकलता है लेकिन, मानों पावक में घी डाला || तेरे चरणों की पूजा से, इन्द्रिय सुख को ही अभिलाषा । अबतक ना समझ ही पाया प्रभु, सच्चे सुख की भी परिभाषा ॥ तुम तो अविकारी हो प्रभुवर ! जग में रहते जग से न्यारे । अतएव झुकें तव चरणों में, जग के माणिक मोती सारे ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003170
Book TitleAdhyatmik Poojan Vidhan Sangraha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRavindra
PublisherKanjiswami Smarak Trust Devlali
Publication Year2008
Total Pages242
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Worship, Religion, Ritual, & Vidhi
File Size8 MB
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