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________________ १४४ आ० तुलसी साहित्य : एक पर्यवेक्षण १८५ १८ दीया मंजिल २ मुक्ति : इसी मंजिल २ मुक्ति : इसी प्रवचन ४ प्रवचन ५ प्रवचन ९ ज्योति से जव जागे १०४ १५ १३५ ४८ १९५ १४७ स्वाध्याय क्यों पढ़ें और क्यों पढ़ाएं ? स्वाध्याय' स्वाध्याय प्रेमी बनें स्वाध्याय प्रेमी बनें आत्मा ही परमात्मा कैसे पढ़ें ? स्वाध्याय और ध्यान सामूहिक स्वाध्याय स्वाध्याय : साधना का प्रथम सोपान' स्वाध्याय एक आईना है समन्वय सबहु सयाने एक मत नयी संभावना के द्वार पर दस्तक अनेकता में एकता का दर्शन सैद्धान्तिक भूमिका पर समन्वय समन्वय मंच की अपेक्षा भेद को समझे, भेद में उलझे नहीं विचारभेद और समन्वय समन्वय सर्वधर्मसद्भाव सर्वधर्मसद्भाव भावात्मक एकता भावात्मक एकता और स्वभाव-निर्माण विश्वबंधुत्व और अध्यात्मवाद विश्वशांति और सदभाव' सीमा में निःसीमता १. २२-५-६६ पडिहारा। २. २१-५-७६ पडिहारा । ३. २२-५-७६ पडिहारा । ४. २९-८-७७ लाडनूं। ५. ६-११-६६ लाडनूं । ६४ १५ २८ लघुता मुखड़ा अतीत का अणु गति वैसाखियां १०९ मुखड़ा बूंद बूंद १ धर्म : एक १३४ अनैतिकता १८८ अमृत अमृत/अनैतिकता ६२/१८५ क्या धर्म शांति के शांति के .. ३८ अणु गति ६. २२-५-५३ गंगाशहर । ७. १-७-७० रायपुर। ८. ५-४-६५ बाड़मेर । ९. ४-५-४९ जैन निशी मंदिर, दिल्ली। ५७ . २०४ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003117
Book TitleAcharya Tulsi Sahitya Ek Paryavekshan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorKusumpragya Shramani
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year1994
Total Pages708
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, History, & Literature
File Size23 MB
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