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विश्व : विकास और हास
चित्त नष्ट होने पर बुद्धि नष्ट हो जाती है ।
इसका तात्पर्य यह है कि पवित्र और बलवान् मन पवित्र वर्गणाओं को ग्रहण करता है, इसलिए बुरी वर्गणाएं शरीर पर भी बुरा असर नहीं डाल सकतीं ।
३. खान-पान और औषधि का असर भी भिन्न-भिन्न प्राणियों पर भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है । इसका कारण भी उनके शरीर की भिन्न वर्गणाएं हैं। वर्गणाओं के वर्ण, गंध, रस और स्पर्श में अनन्त प्रकार का वैचित्र्य और तरतमभाव होता है । एक ही रस
दो व्यक्ति दो प्रकार अनुभव करते हैं । यह उनका बुद्धि दोष या अनुभव शक्ति का दोष नहीं, किंतु इस भेद का आधार उनकी विभिन्न वर्गणाएं हैं। अलग-अलग परिस्थिति में एक ही व्यक्ति को इस भेद का शिकार होना पड़ता है ।
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खान-पान, औषधि आदि का शरीर के अवयवों पर असर होता है । शरीर के अवयव इन्द्रिय, मन और भाषा के साधन होते हैं, इसलिए जीव की प्रवृत्ति के ये भी परस्पर कारण बनते है । ये बाहरी वर्गणाएं आंतरिक योग्यता को सुधार या बिगाड़ नहीं सकतीं और न बढ़ा-घटा भी सकती हैं । किन्तु जीव की आन्तरिक योग्यता की साधनभूत आन्तरिक वर्गणाओं में सुधार या बिगाड़ ला सकती हैं । यह स्थिति दोनों प्रकार की वर्गणाओं के बलाबल पर निर्भर है ।
४. ग्रह- उपग्रह से जो रश्मियां निकलती हैं, उनका भी शारीरिक वर्गणाओं के अनुसार अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव होता है । विभिन्न रंगों के शीशों द्वारा सूर्य रश्मियों को एकत्रित कर शरीर पर डाला जाए तो स्वास्थ्य या मन पर उनकी विभिन्न प्रक्रियाएं होती हैं । संगठित दशा में हमें तत्काल उनका असर मालूम पड़ता है । असंगठित दशा और सूक्ष्म रूप में उनका जो असर हमारे ऊपर होता है, उसे हम पकड़ नहीं सकते ।
ज्योतिर्विद्या में उल्का की और योग विद्या में विविध रंगों की प्रतिक्रिया भी उनकी रश्मियों के प्रभाव से होती है ।
यह बाहरी असर है । अपनी आंतरिक वृत्तियों का भी अपने पर प्रभाव पड़ता है। ध्यान या मानसिक एकाग्रता से चंचलता की कमी होती है, आत्म-शक्ति का विकास होता है । मन की चंचलता
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