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________________ ७४ सूत्र के द्वारा प्रतिक्रमण करना । ३. इत्वरिक प्रतिक्रमण - दैवसिक, रात्रिक आदि प्रतिक्रमण करना । ४. यावत्कथिक प्रतिक्रमण - हिंसा आदि से सर्वथा निवृत होना अथवा आजीवन अनशन करना । ५. यत्किंचित् मिथ्या दुष्कृत प्रतिक्रमण - साधारण अयतना होने पर उसकी विशुद्धि के लिए 'मिच्छामि दुक्कडं' इस भाषा में खेद प्रकट करना । ६. स्वप्नान्तिक प्रतिक्रमण - सोकर उठने के पश्चात् ईर्यापथिकी सूत्र के द्वारा प्रतिक्रमण करना । ' साध्वाचार के सूत्र प्रश्न १५. दैवसिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुर्मासिक व सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में क्या अंतर है ? उत्तर- दैवसिक प्रतिक्रमण में दिवस संबंधी, रात्रिक प्रतिक्रमण में रात्रि संबंधो, पाक्षिक प्रतिक्रमण में पक्ष संबंधी, चातुर्मासिक प्रतिक्रमण में चार मास संबंधी व सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में संवत्सरी - एक वर्ष संबंधी दोषों की आलोचना की जाती है । प्रश्न १६. क्या सभी तीर्थंकरों के युग में प्रतिक्रमण दोनों समय किया जाता था ? I उत्तर- पहले व अंतिम तीर्थंकरों के साधु-साध्वियों के लिए दोनों समय प्रतिक्रमण करने की अनिवार्यता है । मध्यवर्ती बावीस तीर्थंकरों एवं महाविदेह के साधु साध्वियों के लिए प्रतिक्रमण का निश्चित समय नहीं वे जब दोष लगता, तभी उसकी आलोचना कर लेते। है । प्रश्न १७. क्या इसके अतिरिक्त भी किया जाता है ? उत्तर - वस्तुतः जब भी मन संयम से बाहर जाए तो उसे पुनः संयम में प्रतिष्ठित करना अथवा कोई दोष लग जाये तो उसका आलोचन करना । प्रतिक्रमण है । परन्तु विधिवत् सूत्र के पाठ पूर्वक जो प्रतिक्रमण किया जाता है वह दो बार ही किया जाता है । १. ठाणं ६/१२५ २. अमृत कलश Jain Education International ३. अमृत कलश For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.003051
Book TitleSadhwachar ke Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorRajnishkumarmuni
PublisherJain Vishva Bharati
Publication Year2011
Total Pages184
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Philosophy
File Size6 MB
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