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________________ ४९७) षट्त्रिंश अध्ययन सचित्र उत्तराध्ययन सूत्र , And two of greatest size, four of smallest size and one hundred eight of middle size-souls can be perfected in one samaya. (53) चउरुड्ढलोए य दुवे समुद्दे, तओ जले वीसमहे तहेव । सयं च अठुत्तर तिरियलोए, समएणेगेण उ सिज्झई उ ॥५४॥ चार ऊर्ध्वलोक में, दो समुद्र में, तीन जल (जलाशय) में, बीस अधोलोक में, १०८ तिर्यक् लोक मेंएक समय में जीव सिद्ध हो सकते हैं ॥५४॥ ___And four from higher region, two from ocean, three from waters (pond), twenty in nether region and one hundred eight from the surface of earth the souls may be salvated in one samaya. (54) कहिं पडिहया सिद्धा ?, कहिं सिद्धा पइट्ठिया ?। कहिं बोन्दिं चइत्ताणं ?, कत्थ गन्तूण सिज्झई ?॥५५॥ (प्रश्न) सिद्ध जीव कहाँ जाकर रुकते हैं, कहाँ पर सिद्ध प्रतिष्ठित होते हैं (ठहरते हैं), शरीर को कहाँ छोड़कर और कहाँ जाकर सिद्ध होते हैं ॥५५॥ (Q.) Where the perfected souls debarred ? Where do they reside ? Where they quit their bodies and going where they become emancipated. (55) अलोए पडिहया सिद्धा, लोयग्गे य पइट्ठिया । इहं बोन्दिं चइत्ताणं, तत्थ गन्तूण सिज्झई ॥५६॥ (उत्तर-) सिद्ध जीव अलोक द्वारा रुके हुए हैं, लोक के अग्रभाग (ऊर्ध्व दिशा का लोकान्त) में ठहरे हुए हैं, यहाँ मनुष्य क्षेत्र में शरीर को छोड़कर वहाँ लोक के अग्रभाग में जाकर सिद्ध होते हैं ॥५६॥ (A.) Perfected souls are debarred by aloka, residing in the end (the end of highest direction-the top of world) of loka, leaving their bodies in human abode, become emancipated reaching the top of universe (loka). (56) बारसहिं जोयणेहिं, सव्वट्ठस्सुवरिं भवे । ईसीपब्भारनामा उ, पुढवी छत्तसंठिया ॥५७॥ सर्वार्थसिद्ध विमान से बारह योजन ऊपर इषत्प्राग्भारा नाम की छत्राकार पृथ्वी है ॥५७॥ There is a place named Işatprāgbhārā twelve yojan above Sarvārthasiddha vimāna (57) पणयालसयसहस्सा, जोयणाणं तु आयया । तावइयं चेव वित्थिण्णा, तिगुणो तस्सेव परिरओ ॥५८॥ वह पृथ्वी पैंतालीस लाख योजन लम्बी और उतनी विस्तीर्ण (चौड़ी) है तथा उसकी परिधि (कुछ अधिक) तीन गुनी है-||५८॥ That place is fortyfive läkha yojana in length and breadth respectively and its circumference is somewhat more than three times. (58) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002912
Book TitleAgam 30 Mool 03 Uttaradhyayana Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmarmuni, Shreechand Surana
PublisherAtmagyan Pith
Publication Year
Total Pages652
LanguageHindi, English
ClassificationBook_Devnagari, Book_English, Agam, Canon, Conduct, & agam_uttaradhyayan
File Size21 MB
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