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दशाश्रुतस्कन्धसूत्रम्
प्रतिमा वाले साधु को यदि कंटकादि लग जावे, उसको न निकलाने का वर्णन
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प्रतिमा वाले साधु की आँखों में यदि रज आदि पड़ जावे तो उसको न निकालने का वर्णन प्रतिमा वाले साधु को विहार करते हुए जहाँ पर सूर्य अस्त हो जाए उसे वहीं ठहर जाना चाहिए तथा प्रातःकाल में जिस ओर मुख हो उस ओर ही विहार करना चाहिए, इस विषय का वर्णन सचित्त पृथिवी पर निद्रादि न लेनी
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चाहिए तथा पुरीषादि का निरोध न करना चाहिए
सचित रज से यदि शरीर छू जाय तो उस समय गृहस्थों के घरों में आहार को न जाना चाहिए प्रतिमा वाले साधु को हाथ मुँह आदि न धोने चाहिएँ, किन्तु मलमूत्रादि की शुद्धि जल से अवश्य करनी चाहिए
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• प्रतिमा वाले साधु के सामने यदि अश्वादि जीव आते हों, तो उसे पीछे न हटना चाहिए, यदि भद्र आते हों तो उसे पीछे हट जाना चाहिए प्रतिमा वाला साधु धूप से उठकर छाया में न जाए और छाया से उठ कर धूप में न जाए मासिक प्रतिमा सूत्रानुसार पालन करे दूसरी प्रतिमा से ७ वीं प्रतिमा पर्यन्त वर्णन
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प्रथम सप्तरात्रि की प्रतिमा का सविस्तर वर्णन
द्वितीय सप्तरात्र की प्रतिमा और
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तृतीय सप्तरात्रकी प्रतिमाओं का सविस्तर वर्णन अहोरात्रकी प्रतिमा का सविस्तर वर्णन २८० एकरात्रिकी भिक्षु - प्रतिमा का सविस्तार वर्णन
अष्टमी दशा
श्रमण भगवान् महावीर स्वामी के पाँच कल्याणकों का वर्णन
एक रात्रिकी भिक्षु प्रतिमा के सम्यक्तया न पालने का फल
एक रात्रिकी भिक्षु - प्रतिमा के सम्यक्तया पालने का फल
२८५ उक्त १२ प्रतिमाएँ स्थाविरों द्वारा प्रतिपादित की गई हैं २८७
नवमी दशा
चंपा नगरी में भगवान् का विराजमान होना
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पहले महामोहनीय कर्म का वर्णन
दूसरे
तीसरे
चौथे
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भगवान् का साधु और साध्वियों को आमंत्रित कर ३० महामोहनीय
कर्मों का वर्णन करना
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