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४
तृतीय दशा
स्थविर भगवंतों द्वारा प्रतिपादित तेंतीस आशातनाएँ
१ से ६ पर्यन्त आशातनाओं का वर्णन
१०वीं आशातना का वर्णन
११वीं आशातना का वर्णन
१२वीं आशातना का वर्णन
१३वीं और १४वीं आशातना का वर्णन
१५वीं और १६वीं आशातना का वर्णन
१७वीं और १८ वीं आशातना का वर्णन
१६वीं आशातना का वर्णन
२०वीं २१वीं, २२वीं आशातना का वर्णन
२३वीं २४वीं और २५वीं आशातना का वर्णन
दशाश्रुतस्कन्धसूत्रम्
चतुर्थी दशा
स्थविर भगवंतों ने आठ गणि संपत्
कही हैं
आठ संपदों के नाम
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६१
६२
६५
६७
६६
७०-७१
७२-७३
२६वीं आशातना का वर्णन
२७वीं २८वीं और २६वीं आशातना का वर्णन
३०वीं आशातना का वर्णन
३१वीं, ३२वीं और ३३वीं आशातना का वर्णन
३३ आशातनाएँ स्थविरों ने कही हैं।
७४-७५
७६
७७-७८
७६-८१
८२
८३-८५
८६
८७-८६
६०
६३
६५
आचार - संपत् की व्याख्या श्रुत-संपत् की व्याख्या शरीर-संपत् की व्याख्या वचन और वाचना संपत् की
व्याख्या
मति - संपत् की व्याख्या
प्रयोग और संग्रह संपत् की
व्याख्या
आचार्य की शिष्य को चार प्रकार
की विनय - शिक्षा आचार - विनय के भेद श्रुत-विनय के भेद विक्षेपणा विनय
दशचित समाधि विषय
वाणिज्य ग्राम का वर्णन
६६
६८
६६
१०१-१०२
१०४
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१०७-११०
दोषनिर्घातन विनय
शिष्य की चार प्रकार की विनय - प्रतिपत्ति का वर्णन
उपकरण उत्पादन के भेद सहायता - विनय के भेद वर्णसंज्वलनता-विनय के भेद प्रत्यवरोहणता - विनय के भेद
पञ्चमी दशा
११२
११३
११५
११७
११८
१२०
१२१
१२२
१२४
१२५
१३१
१३२
श्रमण भगवान् महावीर के द्वारा निर्ग्रन्थों और निर्ग्रन्थियों को संबोधित करके उनके कर्त्तव्यों का वर्णन धर्मचिंतनादि चार समाधियों का वर्णन १३८ शेष ६ समाधियों का वर्णन
१३५
१४२
धर्मचिंता का वर्णन
१४४
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