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________________ रमालारहंसमुई सयलमक्यिालोवासविसंत नियवयणपामम्मिताणायलंत घलाश्यपे विपरियविासपहायसमितिणिकयायहा गयाणाहही घरुपरचितुडामणि शाराचता पलपनियुणिवर्तिसहरिसरगिरिससिरविसरखरोवद्यामपिसिसिविणटामिमरिहापिययमाग लियाइमामबाळातिणिमुणविणादियोमा चकवहिवतापुरुङहाराश्मदरणादहपावर याख महिण्याहिशयगयाराससहरणसहसोमाणण तिर्वचकतारहमाषण सूरसूरू ययावंसक सरवरपाययडियसिरिसंगढ खपायरणसवसपहायारू चडिचारुचाइहस्यण यहमदियाहारिउसजेसइ कंडविमणिमुंजेसश्करहिमिदियहादिदो निता देवि ननुकाजमा ताससिविक्षिणाणदो सच्छाहमिवलिसदिमागहो मुबपुण संपदासखण्ठ जसवश्दविहिनपिसपनाखवणनवे सिसुसंसवाहिकदनकाला। मुह तडजणअवरुविण शिवडिहिंतिहहामुद्धाराचा सुयलरएसरमाणनमध्यरवि यलिदायवलित तिङ्ण वजयंकरदारहियवकीजयनयानमा रापछिएणणणायन यंडरडकासजायउदियापसळमुनमुणिम्मलेणिमहापाएंगदमडले जसवश्यदे वियमियपकयमुडणवमासहिप्पणतणुरुकालावहिणयुडंडहिकाज्ञयासतोससायगा समस्त धरतीतल को अपने मुखरूपी कमल में प्रवेश करते हुए देखा। वह चूक नहीं सकता।" तब सर्वार्थसिद्धि नामक अपने विमान से चलकर पूर्वपुण्य की सम्पत्ति से भरपूर घत्ता-यह देखकर इन्द्राणियों में श्रेष्ठ वह सीमन्तिनी प्रेम करनेवाले अपने स्वामी के भवन में सवेरे- अहमिन्द्र स्वयं यशोवती देवी के गर्भ में आकर स्थित हो गया। सवेरे यह पूछने के लिए गयी॥१॥ घत्ता-भुवन का उत्कर्ष है जिसमें ऐसे पुत्र का जन्म होने पर जिन्होंने अपना मुंह काला कर लिया, ऐसे दुर्जन और स्तन अपना मुख नीचा करके गिर गये॥२॥ वह बोली-हे पुरुष श्रेष्ठ, सुनिए। मैंने रात्रि में स्वप्न में सुमेर पर्वत, चन्द्रमा, सूर्य, सरोवर, समुद्र और निगली जाती हुई धरती को, हे स्वामी, देखा है। यह सुनकर राजा घोषणा करते हैं-"तुम्हारे चक्रवर्ती पुत्र ३ होगा, मन्दराचल को देखने से प्रियकारक महान् महाराजाधिराज होगा। चन्द्रमा को देखने से सुभग और सौम्य पुत्र के भार के प्रसार से क्षीण उदर की त्रिवलि समाप्त हो गयी। मानो तीनों लोकों को त्रिभुवनपति की मुखवाला, कान्ता का सुख माननेवाला और कान्ति से युक्त होगा। सूर्य को देखने से शूरवीर और अपने प्रताप विजय की चिह्नरेखा से रहित कर दिया गया हो। यह नहीं जाना जा सका कि गर्भ में स्थित राग से उसका से असह्य होगा। सरोवर को देखने से उसका स्पष्ट लक्ष्मीसंग्रह होगा। समुद्र देखने से वह अपने वंश का मुख सफेद क्यों हो गया? प्रशस्त दिन, निर्मल मुहूर्त और ग्रहों के अपने-अपने स्थान पर स्थित होने पर नौ सूर्य होगा, प्रचण्ड सुन्दर और चौदह रत्नों का आश्रय। पृथ्वी का अहार देखने से वह शत्रु का नाश करेगा माह में यशोवती के विकसित मुखवाला सुन्दर पुत्र उत्पन्न हुआ। तब आकाश में देवों की दुन्दुभि बज उठती और छह खण्ड धरती का भोग करेगा। कुछ ही दिनों में हे देवी, तुम्हारे पुत्र होगा, जो कुछ मैंने कहा है है मानो सन्तोष से सागर गरजने लगता है, Jain Education Internation For Private & Personal use only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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