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________________ शिहिविमदिखनकलविहिासिविालदोषमुपविकखिजिणवाड्यबसवायुरिन। समययूरउपमुधाण जसवयश्सारलवण तासकलसुचविखेहावयाखहासचिया। जसोवय वखपविणवध्मरणदिण एकपजिलासणेपेद्वप उशेवठराविहिकपडा हिकिपतकलनाहिलंपलडहिना तामतलासिठगुन्धुपयासिउराममाएमागासहिजसवः यहेकरी तिजधाणसारी सालविनिमाइसहिरानजसवश्कृचिहजिणुसंसविही जसवश्या सुपावतीपतिवन इदाहापरमदिही जसवन्यजसमाहियलतमिहा जसवश्य तनिटना हेपटांडवियविदा परियाणेविदिहमपिदमुणिनम्मासहिर होहापाणिदिविउपसागसम्माश्य सिरिदरिदिहिकिर। निशाध्यचिमुहारपडिमघरगणय सुरमालयप्रणया महंगणए हरिकरिबिजलणसिजलियादिहासालहसिदि पासलीया पिनचंदखुरंदरशुलवलए जिष्णुदेविदेदहएकर लय सासंदरिणविमसुराखरहिंसावणवितरहिंसदिसहरहि सहेश्ववसरममारणभरहन मधम्माण्डागावेप्पिणुनिम्मकरमाजसवश्मणविटासहावय हिसिक ३२५ निधियाँ सिद्ध हो गयीं। अनुकूल पथ में उसे एकछत्र भूमि प्राप्त थी। लोग कहते हैं कि श्रीपाल के पूर्व जन्म में अर्जित पुण्य का विस्तार हो गया। तब सुखावती ने यह कीचड़ उछालना शुरू किया कि नगर की खदानों यशस्वती की कोख से जिन-भगवान् का जन्म होगा, यशस्वती का परम सौभाग्य होगा। यशस्वती का से जो धन निकलता है उसे यशस्वती अपने घर में प्रविष्ट करा लेती है, लेकिन यशस्वती के द्वारा संचित धन यश संसार में घूमेगा। यशस्वती के चरणों में इन्द्र प्रणाम करेगा। यह जानकर कि गुणी दिव्य मुनीन्द्र छह मृत्यु के दिन एक पग भी उसके साथ नहीं जायेगा। भीषण मरघट में उसे अकेले ही जलना होगा, दो कपड़ों । माह में होंगे, आज्ञादान के सम्मान से सम्मानित श्री-ही-कीर्ति आदि देवियाँ सेवा की सम्भावना से आयौं। के साथ । लम्पट पुत्र-कलत्र से क्या ? घर के आँगन में धन की वर्षा हुई। उसने सिंह, गज, सूर्य, समुद्र और जल आदि सोलह सपनों की आवलि घत्ता-तब मन्त्री ने कहा और यह गुप्त बात प्रकट कर दी, इस प्रकार मत कहो। यशस्वती की तीनों देखी। जिन्होंने करुणा की है, और जिनके चरण प्रचण्ड इन्द्रों के द्वारा संस्तुत हैं, ऐसे जिन भगवान् देवी लोकों में श्रेष्ठ शीलवृत्ति को दोष मत लगाओ॥८॥ की देह में स्थित हो गये। सुर-असुरों तथा विषधरों सहित भवनवासी और व्यन्तरों ने उसे प्रणाम किया। उस अवसर पर सुखावती का मान-अहंकार च्युत हो गया, उसके मन में अनन्त धर्मानन्द हुआ। सुखावती ने ईष्या से रहित होकर, स्वयं आकर यशस्वती को नमस्कार किया, और कहा JainEducation International For Private & Personal use only www. j6570
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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