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________________ श्रीवालयासिहो मानियउसहावश्यनिवसंगाउ मेरहजेतहसामामहिहस विद्याधरयार विखभिनयसुरतरुवरु वविवारुवामायखन्नतकु। लयाहरजामानिसमर्श तासखग्नवगवन्निसमागमनिमहे निसियरभिसिहाउग्नटा मकरगिगण्याजिनविणण्डा विनतेपवितगनातण दासहिववियुडखलाया कदह कासर्विकारश्चादा तहिंपउनठनिमखरहेंडिवि गवरी पयायमूडरिमधिमंडविअहवामापजगवसकादया बडियोरिसविणासहिालनिर्मिखदेवायदंडेंधयरवल्लवलदलगणपडे पडपाहाणखर बजरनसाधनंथी जशहदहिं बाहहडिाउलवाहिताशुद्धयाहार पालना मिचकेसा विज्ञादरहगामरश्मलातातिनिमणिविछ। सिवस्करिकरविवंचकमारेंधायन असिजलक्षारपसानि हसविपळतविडहामाज्ञामुडंसाचकहिजयासी रिकाश्मअहिणंदनियतनहार सुहमतणाश सुखावती के द्वारा ले जाया गया वह पल-भर में वहाँ गया जहाँ वह सीमान्त महीधर था, जिसके कटिबन्ध और मनुष्यों के ईश्वर चक्रवर्ती समाट् होवोगे। पर बड़े-बड़े कल्पवृक्ष लगे हुए थे। स्वर्ण के रंगवाले वे दोनों जब लताकुंज में बैठे हुए थे तब दो विद्याधर घत्ता-यह सुनकर तलवार अपने हाथ में लेकर कुमार ने खम्भे पर आघात किया। उसकी तलवाररूपी अपने हाथ में तलवार लिये हुए आये मानो आकाश में सूर्य और चन्द्रमा उग आये हों। तब विनय का प्रयोग जलधारा से वह पत्थर भी दो टुकड़े हो गया ॥३॥ करते हुए कुबेर श्री के पुत्र श्रीपाल ने मधुर वाणी में उनसे पूछा-आप दोनों सुन्दर कान्तिवाले दिखाई देते हैं। बताइए आप किस कारण, किसके लिए आये हैं? उन्होंने कहा कि अपना नगर छोड़कर चरण-कमलों से आकाश मण्डित करते हुए हम लोग आपको खोजने तथा द्वय बुद्धि और पौरुष की परीक्षा करने आये वे दोनों विद्याधर-तुम्ही विजय श्री का वरण करनेवाले चक्रवर्ती हो, इस प्रकार अभिनन्दन कर चले हैं। लो-लो यह तलवार और इसे नमस्कार करो। यदि तुम पत्थर के इस खम्भे को तोड़ देते हो तो तुम विद्याधरों गये। सुखावती के मन्त्र से आराधना कर, Jain Education International For Private & Personal use only www.jaine 6410rg
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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