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On that day, the valiant warrior Sri Palak, the son of the great king, was filled with love for the beautiful Ganesh. He was adorned with a garland of flowers and his face was radiant with joy. He was wearing a red robe and his body was adorned with precious jewels. He was sitting near the Siddhakut Jain temple, which was adorned with countless jewels and was surrounded by a beautiful garden. Suddenly, a fierce bird, mistaking Sri Palak for a piece of meat, swooped down and carried him away in its talons. The bird flew high into the sky, shaking Sri Palak violently. The king's robe fell off and his ring slipped from his finger. Sri Palak was terrified, but he managed to free himself from the bird's grip and fell to the ground. He landed near a group of people who were searching for him. They recognized him and rushed to his aid. Sri Palak was grateful for their help and he thanked them profusely. He then went to the Jain temple and offered his prayers. He was filled with peace and joy, and he knew that he had found his true purpose in life.
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________________ दिणुएतिदिरशसहरियर्दिजिहणउधियश्सगोयरिख श्रीपालक ऊत्तेस हिाविदत्तहिंडहरमपुत्रवेप्पिण गणेशणपसर्प ज्यपाले ज्या सावपिणारुणावरणवमुखरताई मचिमासपिड तेरुडेनिठणिवर्चद्धरूंदगयणयहो चंयछलिया लियाकरकमलहोमिताबापस्यूरिसणामकधारिस हावयासाहतावहारासारकणालबाहानम्मलहाघा रियाणेविअप्रियवाणिलहाधाणोणाणरतपस्वयं सिहकडंजिणलवणसमीद पाजावपक्षिधरणियलेपरिहिठातापरावलेविणवाहि तसिठखयरउडिमहेचा चला तदोपहंलग्ननगमकवखापडिउधरहिाक करहिनियछिउजाणिविमयणवश्पटाछित यंत एपतिदिहजिणहरुडविटयडरकलकणिकयक सायुशविण्यत्तदाइपदासाइशविदडियाऽदहका लिसकवाडजेंदिहणिहरसंचिवमलजेंदिहेंनष्य विद्याभर जिससे प्रतिदिन आनेवाली रतिरसरूपी घोड़ियाँ इन मनुष्यनियों के द्वारा यह ग्रहण न कर लिया जाये इस प्रकार उस प्रिय को उस दुर्ग्राह्य घर में रखकर आज्ञा लेकर वह प्रणयिनी चली गयी। अरुण / लाल कपड़े से ढंके नाना रत्नों से चमकते हुए सिद्धकूट जिनालय के समीप धरतीतल पर जैसे ही बैठा, वैसे ही अपने शरीर हुए उसे मांस का पिण्ड समझकर तीखी चोंचवाला भेरुण्ड पक्षी राजा को ले गया। विशाल आकाशतल से को हिलाकर राजा श्रीपाल उठा। वह चंचल पक्षी डरकर आकाश में उड़ गया। कम्बल उसके पैरों के नख उसके कर-कमल से अँगूठी गिर गयी। से लगा हुआ चला गया। धरती पर पड़े हुए और मदनवती का इच्छित समझकर अनुचरों ने उसे देखा। यहाँ पत्ता-आदर्श पुरुष के नाम को अपनी गोद में धारण करनेवाली, दुःसह वियोग की आग के सन्ताप पर इस श्रीपाल ने भी दुष्कृत लाखों पापों और दुखों का नाश करनेवाले जैन मन्दिर को देखा। स्तुति करते को दूर करनेवाली, उसे रक्षा करनेवाले अनुचरों ने घर आकर निर्मल पवित्र बप्पिला को सौंप दिया।॥१४॥ हुए. दुर्नय को नाश करनेवाले दृढ़ वज्र के किवाड़ खुल गये। जिसको देखने से संचित कुदृष्टि पाप नष्ट हो जाता है। जिसको देखने से केवलज्ञान उत्पन्न हो जाता है। in Education Internetan For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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