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________________ गहिणियातसुसणवसुंधरिक्षारिणिय अणेकपहश्सहकारिणिय सिरिमन्यसायसंताविमल चो छाधरदासतासावमल रायविवाहाटक्सिानिमालवणमणिपारिगाहमश्वयश्कताउमरण विघदमध्यमाछवश्ददिहश्याचा रसणासुरकासमणिद अवरससणसहाविण अच्युतस्वदया मुहवाइकोमलहळाचित्रोणसुपसलावालंडियाच्यारिवि उत्पन्ना किनवयउ संबड्याउवादेवयन तहिचितवयचक्कसद्धिाश्रण विश्वपादेवीधयासिसिहासनप्यमनविकले श्हायउपेछ। गयणयले सरदेदानमपियन रिसिदिङ्गतम्अवगणिय उमुनगहडझन्ड्स लपणवायसुयुएसुद्धहसमुदाय सासाधासणउ युद्धउर्चालुकमाणसउमइसमयाति सोधिचविलेहमरेविषयमनस्यविले निणधम्मुतिसद्विाता वियधनलेविरुजश्वश्विदारहपवितहोबाइपयासियउसनजिअहरतश्लामियनानसा रियडूसहसवरिश्मामासुकविरिसिमामदिउष्णबडएवदिकनिदिवि कोपसरविवि हिणाविदियलिवि सोपश्यम्हारठणविषमुहलसाजिमहारउधम्मकालासुरदेवहोजामा गृहिणियाँ थीं। वसुषेण, वसुन्धरा, धारिणी और पृथ्वी। ये शुभ करनेवाली थीं। श्रीमती, वीतशोका, विमला को दिये जाते हुए दान को सुरदेव ने नहीं माना, उसकी अवहेलना की । वह मरकर दो दाँत का गधा हुआ, और वसन्तिका ये चार उनकी गृह दासियाँ थीं। इन आठों ने वन में मुनि के पास पवित्र व्रत ग्रहण किये। फिर कौआ, फिर चूहा, फिर साँड, फिर दाढ़ों से भयंकर सुअर, फिर चाण्डाल और कुमनुष्य । मेरे साथ वह कन्याएँ मरकर अच्युत स्वर्ग के इन्द्र की शुभसूचित करनेवाली देवियाँ हुई। भी नरकबिल में डाला गया। मैं मरकर नरकबिल में उत्पन्न हुआ। मन-वचन और काय की शुद्धि से जिनधर्म ध्यत्ता-सुरकामिनी रतिषणा, सुहाविनी सुसेना (सुसीमा), कोमल हाथोंवाली सुखावती और सुप्रशस्त की भावना की। फिर बकुल नाम के चाण्डाल ने यतिवर की सेवा की। उन्होंने भी उसकी आयु प्रकाशित चित्रसेना ॥२०॥ की कि उसके सात दिन-रात बचे हैं। असह्य भव-ऋण को हटानेवाले उन सात दिनों में संन्यास कर इस समय वह स्पष्ट रूप से स्वर्ग में उत्पन्न हुआ है। विधि के द्वारा लिखी गयी लिपि को कौन मिटा सकता है? व्रत करनेवाली चारों दासियाँ भी वनदेवियाँ हुईं (व्यन्तर देवियाँ हुई), उनमें यक्षेश्वरी, चित्रवेगा, यह नया देवता तुम्हारा पति है, और लो, वही हमारा नया धर्मगुरु है। धनवती, धनश्री व्यन्तर देवियाँ आज भी दिव्यकुल में उत्पन्न हुई हैं, यहाँ इनको आकाशतल में देखो। ऋषि पत्ता-मरटेल की जो Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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