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________________ बिरामदासब्सरहामणियामा हाकदानिपचित्रपंसलियल नामतीसमोपरि समताळा माझवका निणवयपश्याय णिनि निमाहियमल्लगमावि मा हालझ्मालामालिन सङ्ककत्तयमणि मालिजा गनसिरिमाण यो कमलागणु देविहरंतन काण णेपउनमयतालउधमलमा लठमार्डपसिइई महिहहरिद्ध उहंसर्दिधवलि चक्कदिमहाल चलजलदलिउ कमलहिंक लिउ गयमयसामल केसरपिंगल पन्ना दिवदेव्यात्तीमुत्सद्दा हिनालिउसमरडिंकालिदिनापET रकुटेषित्तवस्मरण हरुमसरोवरूमणे विक्ररिलन सनसंसखियट कयररिसिसव। सासिदारत आसिजम्मसंचिमटण हदसम्वणिनंदय बारश्यपियारी दाताधारणमहाशादासपुरिएहसणाल वजहिंदूविदिविविवादरझमचरिखकहवचारंखलए नहटमा लमउपचला हपापहरणालयविहदिवरक्षवंतशवनिविनिवडियर हाहपमलोदिम मप सन्धि ३१ था। वह अपने मन में चौंक गया, पूर्वजन्म की उसने याद की। मुनि की सेवा करनेवाले देव ने कहा घत्ता-पूर्वजन्म में मैं सुकान्त नाम का वणिक पुत्र था, धनसंचित करनेवाला। और तू रतिवेगा नाम से जिन-वचनों को सुनकर और अपने हृदय में मानकर मालती की माला से शोभित मणिमाली देव अपनी मेरी प्यारी घरवाली थी॥१॥ कान्ता के साथ गया। नवकमल के समान मुखवाला और श्री को माननेवाला वह आकाश में बिहार करता हुआ, जिसमें ऊँचे तालवृक्ष हैं, ऐसे धान्यकमाल नामक कानन में पहुँचा, जो जग में प्रसिद्ध और वृक्षों से यह मृणालवती नगर दिखाई देता है, जहाँ दोनों का विवाह-प्रेम हुआ था। किसी प्रकार चीरांचल से समृद्ध था। हंसों से धलित और चक्रवाकों से मुखरित था। उसने सुन्दर सर्पसरोवर देखा, जो चंचल जल पकड़ा भर नहीं था, और वह उन्मत्त पोछे लग गया था। प्राणों के हरण के भय से विघटित, दौड़ते हुए हम से आन्दोलित, कमलों से पुष्पित, गजमद से श्यामल, केशर से पिंगल, पत्तों से नीला और भ्रमरों से काला लोग यहाँ गिर पड़े थे। यहाँ तुम्हारे पैरों का खून गिरा था। Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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