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________________ थाकथन पत्तरदाहिमितंनिलमितणु सुखकरकेउवरुतेरठ कहिसोअछ। प्रत्तावतीप्राडिका सहजणल सहिणिसणानिमुगिसंजमधरि पिथकहनिणय सेनिणिप्रतिपूर्वक यापकलमकारा पकाहादणसवणुपराश्यहा जपावरका णि करडमलोयणुदेविणामसियउ पयजयलउसुहगारठा॥१०॥ जिहासिमडवाए पयामि निधासबकारपपिहिलसमासिड शहा रश्मणणामवायउचित समिविहारछिउसुंदरागरूर्मदपवणेचलेर तेहिताला तालितालतालरपियालए वेघाहरपसुशुविजादा पाय गुहालहावसहरू माडावितहिजिल्लमपराइट डेनिफणिवश्वणुबलाइट काविशयहर नागरुगरलपवतेयत्नारियादविहिविभिन्तन्त्रणु गउखासणथरुषणिवश्ससबूण व्यायड खमपूणरतिषण वलायतिपवद्णायजणु तटकराएपकुमश्चकडं काहलोडरमाणायक तारएसपहात्तणियपनारिश मईपिलयमाश्गारिणाधना हिमनबठकामणिद्दपण सहेक उमिलियठ वरजरचरणचप्पियउ दिसिहिंमलबठकलिमलाश मणेषाधिनसिपजलमरविंध याबादबिउनियवश्यमधरा कवणुण्डकिंपियममर्किन्नरू यकृसक्कुर्किकिनरुविसकोणमनन २८५ पाया और इसीलिए हम दोनों ने अपना मन नियमित कर लिया। बताओ तुम्हारा कुबेरकान्त वर कहाँ है? को देखा। क्रोध से उसने बं झं हंसं वं क्रं कहा और गरुड़ के समान उसने वह विष उतार दिया। उन दोनों सुख का जनक वह, इस समय कहाँ है?" इस पर सेठानी कहती है-हे संयमधारिणी और जिन के में प्रगाढ़ मित्रता हो गयी। विद्याधर अपने नगर और सेठ अपने घर चला आया। वह विद्याधर दुबारा उस चरणकमलों की मधुकरी, प्रिय की कथा सुनिए। बन में आया। वहाँ बहुत-से नगरजनों को देखते हुए उसकी कान्ता गान्धारी ने कहा कि मैं यहीं पर हूँ और घत्ता-एक दिन घर पर आयी हुई जिन संन्यासिनी को आहार देकर उनके शुभकारक दोनों चरणों को कौतुक से क्रीड़ा करते हुए लोक को देखेंगी। तब रतिषेणा नामक विद्याधर की स्त्री गान्धारी ने मेरे प्रियतम नमस्कार किया।॥१०॥ को देखा। पत्ता-निर्दय कामदेव ने उसके हृदय को विदीर्ण कर दिया, मानो श्रेष्ठ गज के चरणों से आहत जल जिस प्रकार तुमने, उसी प्रकार उसने अपने तप का कारण थोड़े में बताते हुए कहा- पहले यहाँ रतिसेन दिशाओं में उछल पड़ा॥११॥ नाम का सुन्दर वाणीवाला विद्याधर भूमिविहार के लिए आया था। जिसमें हिंतालवृक्ष आन्दोलित हैं, और जो ताली-ताल और तालूर वृक्षों से प्यारा है, ऐसे नन्दनवन के लताघर में वहाँ सोया हुआ था, विषधर ने मन में कामदेव के बढ़ने पर प्रेम की उस अन्धी ने अपने पति से पूछा-हे प्रियतम, यह कौन है? क्या उसके पैर के अंगूठे में काट खाया। मेरा स्वामी भी घूमता हुआ वहाँ पहुँचा। चिल्लाकर उसने वन में साँप मनुष्य है, बताओ क्या वह यक्ष है? क्या किन्नर है ? क्या विषधर है ? Jain Education Internations For Private & Personal use only www.jan569org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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