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________________ चनीमियययसता विमलसिरीलदोगदिणि सुहकारिणिसुयमणदारिणिरश्वेया। स्वाहिणिशिविमलसिरिसामणिविदासी छवियाधिसानदेन जियाटा नधरिणिनंदणुमुकंठससामुसामवसकंधालासखणिवासुद्धवास्वरविवारदार समजायकरविजश्वनावसवितावासु तेरीतगुरुडव्हासवराम मिदविणनगन्या मिञ्जमाम गउचारिगोंमोजामृताम् चकवसंखधकरपउन कम्मथनलसमपण उटिंटियाकडरिव खिम पवारिससखिणिधुमक्कासनदिपसकतहो वरउपरवाइश्क वरिटुक निनिसतिकनिविसवा मरूमारविहार रिसाजणा विवरुणच मेडमनिहायडेणा बुङवरूविपणा हुपरोवडेण गलगजिवितहविवंच अवलोयांव दंपश्यनगरबता कुटेलग्नान पिसुण्यसमठान सावसहेवाल राजधरिणिए हरिणवदरिणि वणवर पराश्नावादाविपटरवपयलिया दोहंविमुह २०५। घत्ता-अपने पिता के चरणों का भक्त श्रीदत्त, उसकी गृहिणी विमल श्री थी। रति की नदी, सुन्दर, शुभ करनेवाली रतिवेगा नाम की उसकी कन्या थी॥१३॥ १४ विमल श्री का भाई, शोक से रहित एक और सेठ था अशोकदत्त । उसकी गृहिणी जिनदत्ता थी। उसका पुत्र सुकान्त था। सुन्दर और सौम्य वह सोम की तरह सुकान्त था। तब ससुर के निवास और द्वार पर धरना देकर और बारह वर्ष की यह मर्यादा कर कि यदि मैं (इस बीच) नहीं आता हूँ तो तुम अपनी कन्या अन्य वर को दे देना। मैं निर्धन हूँ, हे ससुर, अभी कन्या ग्रहण नहीं करता। और जब वह वाणिज्य के लिए चला गया, तबतक बारह वर्ष पूरे हो गये और समय के साथ कन्या के स्तन भर गये। साक्ष्य और निबन्ध से मुक्त होकर उसने कन्या को पुकारा और सुकान्त के लिए दे दी। (इतने में) दुश्मन आ पहुँचा, निर्दय और तीखी तलवार लिये हुए। वह कहता है कि मैं वर को विदीर्ण करूँगा-मारूँगा। वृद्धसमूह ने उसे बलपूर्वक रोका। वधूवर भी घर के पीछे दरवाजे से भाग गये। तब गरजकर और कंचुकियों को डाँटकर तथा दम्पति की चरणपरम्परा को देखकर घत्ता-अभग्न, दुष्ट, ईर्ष्यालु वह क्रुद्ध होकर पीछे लग गया। अपनी गृहिणी के साथ वह वन में पहुँचा, जैसे हरिणी के साथ हरिण हो॥१४॥ दोनों के पैरों की लालिमा प्रगलित हो गयी, दोनों के मुखकमल Jain Education International For Private & Personal use only www.jan54909
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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