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________________ तोगतिलमंडलमिशाबा जेसहासारवडा तनिधर्मलविवजिया पियवक्षणाहिंधळाहणहिनियनि श्रपुरदाविसझियाना किहरसंपन्नबंधणारा आसावणमिनकुमार तामसपिउतणाक अर्थकाततस्थ पणण जिणचरणलापनिचलमणमा चुइंचहलपाणिवत्रा वक्रवनियासि सिचिंउडवहरणसहिपहाईपहनामातंगर्दवच आया कंबहटासखलमान बहनाणसासणवान उडवटर अळकार्तिककुत्र मुमणाजीउ उद्धवह उपसिरिमणिविलास मुघठणय कंपपुराजासंबोध मुकाविससु हेला जयाजदरायण छुङवलपरसुवाय न। ANAND Wश्यरदकियाहसहलुहासि धामापबहउखटाहोजासि। AAAAश्य लणवितणकयदेहादिति निदपुरहाविसनिमगावकिति साधरजापविलायमावि सिरुपयाजदालएढाश्यलासरहहोचरिहरिसरहदो कहवकहन महजोश्यनाथालवावतापसापचवरगलगनुमाहापुचवसासुरमखलवदाणमुणश्या विषयसारसदपाश्सारजापहरसावरकर्दिविनाठमाकलपणहपरिलयहोसार मङचरपुरिस दिडहाइरिटायमोकरमवारिउचरिख जापासुडासयगारपणाताचावउत्तणकुमारराग गुरुको सन्धि २९ रस को बाँध लिया हो। दूसरों की बात छोड़िए, हम लोगों के लिए तुम सफल होगे। अन्याय से दूषित व्यक्ति जो युद्ध में अवरुद्ध थे और बाँध लिये गये थे उन राजाओं को मुक्त कर उनका प्रिय वचनों और क्षय को प्राप्त होता है।" इस प्रकार कहकर उसके शरीर की दीप्ति बढ़ाकर अर्ककीर्ति को अपने घर के वस्त्राभरणों से सम्मान किया गया और उन्हें अपने-अपने घर के लिए विसर्जित किया गया। लिए विसर्जित किया। घत्ता-घर जाकर लज्जा छोड़कर उसने अपना सिर (पिता के) चरणयुगल पर रख दिया तथा शत्रुरूपी सिंह के लिए श्वापद के समान भरत का मुख किसी प्रकार बड़ी कठिनाई से देखा ॥१॥ जब कुमार अर्ककीर्ति यह सोचता है कि मैं बन्धन को प्राप्त क्यों हुआ? तब जिन-चरण में लीन और २ निश्चल मनवाला राजा अकम्पन कहता है-"तुम बाँधे गये मानो राजवंश में पताका बँध गयी, तुम बाँधे लज्जित होते हुए भी पिता ने उससे कहा कि “गर्भ गिर जाना अच्छा परन्तु ऐसा पुत्र न हो कि जो व्यसनों गये मानो स्वजन-समूह बँध गया, तुम बाँधे गये मानो गजदन्त बाँध दिया गया, तुम बाँधे गये मानो तीर का में रमता है, दुष्टों के वचन सुनता है, अविवेकशील होता है और स्वजनों को मारता है, जो ऐसा है वह कहीं महान् फलक बाँध दिया गया, तुम बाँधे गये मानो धान्य से बीज बँध गया, तुम बाँधे गये मानो पुण्य से जीव भी चला जाये। यह अच्छा है, वह प्रजा और परिजनों को ताप न दे, मेरे चरपुरुषों ने इसका दुर्दान्त पापमय बंध गया, तुम बाँधे गये मानो सिर पर मणिविलास बाँध दिया गया, तुम बाँध दिये गये मानो सुकथा विशेष चरित मुझ से कहा है।" अत्यन्त दुर्नयकारक होते हुए उस कुमार ने अपने मन में विचार किया कि पिता निबद्ध कर दी गयी। खेल-खेल में जय और जयराजा ने तुम्हें बाँध लिया मानो रसवादी ने (धातुवादी ने) के कोप से Jain Education International For Private & Personal use only www.ainelibrary or
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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