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________________ दस्यसमप्रमादणविमले तमुयरिय मदाडरकलरिखं पमाणमडरंगउँसम्मासिहरमुसोमव यणसियानवपक्षणातविद्वरदलिउसकालपाचलिलफिविदियसमरा महानरयविवर मण पालगुणिलयावरदीववलय सिराहाहरिणा महामगिरिणी सएसायसहल विदेहमिविला जलारियनमड़ीमंगलावाशीना पहपुरखापूससाण नकमङमहाहरुणाम सुश्वसनव गुणसहित चावडणंदाविनकामाक्षातहोगहिणिसाहार संदरि किंवमिजणादिरियाम्पसरविणुद्धजप्यिमान म्रोधकदेउज्यसेन विवाद परीक जिणामदासवाणपावप्पिाणु स्यममुहहलणतहत सजा कमळणामदविवसषिहमत सोजससेणुलासनियरजा कान म्वविवादधरश्माकरु तासिरिहारासदिचपटुकला वारा हलिउवलोकविमुकठ तेणविघुसासणुपारदम नचवा RT विसोखणलहठ तपेलविवरश्तेसाविठ पहउचिरूमश्कहि मिणिसविउ एमकदिमियाहाणिहिताडित गमकहिमिखरपवाणेमाटि एमकाहमिरखपुजेशपिठ एमकहिॉमहडकंकयिष्ठ एचसरविसुमरिटमासले जमहरिसिंहेपासलक्ष्मतम तनकरविव ण अमोह के साथ वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। महान् दुःखों से भरे हुए तम से उत्पन्न दुःखोंवाले उस नरक को छोड़कर श्रीधर अपने मधुर स्वर्ग-विमान में चला गया। उस समय पापों को नष्ट करनेवाला शतमति अपने समय से आपस में लड़ते हुए महानरक विवरों को छोड़कर चला। मणिमय कमलों के स्थान श्रेष्ठ पुष्करार्ध द्वीप में, जिसके अग्रमार्ग में हरिण स्थित हैं, ऐसा सुमेरु पर्वत है। उसकी पूर्वदिशा में सफल विदेहक्षेत्र में जल से भरी हुई नदियोंवाला मंगलावती देश है। घत्ता-उसमें धन-सम्पन्न रत्नसंचय नगर है। उसमें महीधर नाम का राजा है जो ऐसा जान पड़ता है मानो कामदेव ने पवित्र बाँस से उत्पन्न प्रत्यंचासहित धनुष ही प्रदर्शित किया हो॥१३॥ १४ __ सौभाग्य में सुन्दर और नाम से सुन्दर उसकी गृहिणी का क्या वर्णन किया जाये ! अपने अशेष पापों को भोगकर तथा जिनमत में श्रद्धान को पाकर शतमति पुण्य के फल से उसका पूर्णचन्द्र के समान मुखवाला पुत्र उत्पन्न हुआ। वह जयसेन सूर्य की किरणों के समान प्रतापवाला था। जब वह विवाह के लिए कन्या का हाथ पकड़ता है तभी श्रीधरदेव भी वहाँ आ पहुँचा। उसने धूल से भरी हुई हवा छोड़ी। उसने भीषण विघ्न शुरू किया। विवाह में किसी को भी आनन्द नहीं आया। यह देखकर वर अपने मन में विचार करता है कि इसको तो मैंने कहीं भोगा है। इसी प्रकार कहीं पत्थरों से प्रताड़ित किया गया है। इसी प्रकार कहीं खरपवन से मोड़ा गया हूँ! इसी प्रकार कहीं धूलसमूह से ढका गया हूँ. इसी प्रकार कहीं मैं दुःख से कांपा हूँ ! इस प्रकार विचारकर उसे नरक की याद आ गयी और उसने यमधरश्री के पास जाकर व्रत ग्रहण कर लिया। Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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