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________________ अलया रिहे होतनासिमहावखराण तश्यकंटेसबुनुहमतिमंतसजावविवाणछायाणिछा गनोसि विवरतेचिलोसिअश्याचवाडि सिनिपतरतादि न्हावड़गमानश्यामरावज्ञ संसारए दाराजिणवनणसारामिहारिमार्हि दिमाखतहिाहाकालनियेय मापादिगुलीमारिन लासितमीसहठसि मुणिदाणा वडघुमसिहाएजुडंगतुजासि गाणेणणासियहिंदि होसि हादता सिस्वगवविपण मसकोण किउवास्तवचरण दियहिहाहरणमोहम्मि सोदालड्डदेठमणिशुल सईयहविमाणमिन डकावसाणम्मि झवदावम्मि अविदहमिहिरका लहमणचरिण्डारकिरणहपियसपारायया पसरसरायसकयणाहणहाम्म संदरिदेवाम्म जा उमिटर मालावणीसह पाऽकरणार सणिकामिणाकामाचालवलयानहकर चाइसरोण्या मशाणठहोश दिवोमहाजोरायतानिववियनहाठलदा निम्नविलिविनियघरचासदाजार यासाससंयपहहो अरहतहोसवारिविणासहोदावहिणाणवारणसंजाया विनिविपस्यो हर्बश्राया लश्समधलापिलाचे सावहिनिणदसणुसनाव अतिनकिकिसकपाकिाशज्ञ घरलायकवधिमाशगुणवतहाविदारहकिनशमनलहुमणमोठविश्वसनकलेवरुजण्या वियप साडङदेहातपाधिमाविवाद समउवचल्लं किनाहियएसंघहियले मिळवतजाव २४३ महलह झालावणासह महायसणारायण पसरायमारहजनुदावम्मि पनि पत्ता-"जब तुम अलकापुरी में राजा थे महाबल नाम से, तब मैं मन्त्र और सद्भाव को जाननेवाला मैं प्रीतिंकर नाम से उत्पन्न हुआ। स्त्रियों के द्वारा इच्छित, हे भद्र, तुम सुनो, भ्रमर समूह के समान केशराशिवाला, तुम्हारा स्वयंबुद्ध मन्त्री था॥५॥ प्रेम का सरोवर, दिव्य महाज्योति यह मेरा छोटा भाई है। पत्ता-स्नेह से नित्य भरपूर अपने गृहवास से हम दोनों निकल पड़े तथा विद्यमान शत्रुओं का नाश जब तुम निद्रा में थे और जब कुवादियों द्वारा गर्त में फेंक दिये गये थे, तब स्वप्नान्तर में भी दुर्ग्राह्य हे करनेवाले स्वयंप्रभ अरहन्त के शिष्य हो गये॥६॥ सुभट, मैंने तुम्हें संसार का हरण करनेवाले जिनवर के उन वचनों का सार तुम्हें दिया था कि जिससे बड़ेबड़े ऋषि-मुनि सिद्ध हुए हैं। फिर तुम ललितांग देव होकर, दिव्य शरीर छोड़कर भयंकर शत्रुओं का नाश करनेवाली भूमि में उत्पन्न हुए। लेकिन मुनि को दान की बुद्धि और अनेक पुण्यों की सिद्धि से तुम यहाँ उत्पन्न हम लोग अवधिज्ञानी चारण हो गये हैं और तुम्हें सम्बोधित करने आये हैं। तुम सम्यक्त्व ग्रहण करो, हुए हो, ज्ञान के द्वारा तुम मेरे द्वारा जान लिये गये हो ? सम्बन्धित हो, क्या तुम नहीं जानते ? विद्याधर राजा व्यर्थ बकवाद मत करो, सद्भाव से जिनदर्शन का विचार करो। है' या नहीं है', इसकी बिलकुल शंका नहीं के वियोग के कारण भोगों को छोड़कर मैंने इन्द्रियों की भूख को नष्ट करनेवाला भयंकर तप किया और करनी चाहिए, इहलोक और परलोक की भी आकांक्षा छोड़ देनी चाहिए। गुणवान् व्यक्ति के दोषों को ढकना सौधर्म स्वर्ग में सौभाग्यशाली मणिचूल देव उत्पन्न हुआ, दु:ख को नाश करनेवाले स्वयंप्रभ विमान में। इस चाहिए, जो मार्गभ्रष्ट हैं उन्हें मार्ग में स्थापित करना चाहिए। यह विचार नहीं करना चाहिए कि मनुष्य अपवित्र जम्बूद्वीप के पूर्व विदेह की पुष्कलावती भूमि में पुण्डरीकिणी नगरी है। उसमें अपने राज्य को प्रसारित शरीर है। साधुओं की देह से घृणा नहीं करनी चाहिए। संघ के हित से भरे हदय से और वात्सल्य के साथ करनेवाले राजा प्रियसेन की सुन्दर पत्नी है। अपने पति से स्नेह करनेबाली उससे, वीणा के समान शब्दवाला उनकी वैयावृत्य करनी चाहिए। Jain Education International For Private & Personal use only www.jain-485g
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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