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________________ गयलवसमासहियामिसाल अपविण्यवहमानबाहेजस्यगचक्काहिंधमुवादे बाणेदवरोए हियमश्वराहंधणमिचार्कपर्किकराई विजयुकहसुमङगरलनकादिकारणताकासाला বা সন্ত্রাঙা रिसिथापनवपरिचत्रमाण अजवम्मुनामवधिविनिमआणुजाउसिव प्रागारमुनिवानी प्यमुदखदारणाडापामेणमहावखवलसणडाधला चिरुसम्पल कथन। गिरिहे अलयानरिह संतुहंसवाहिनसउवदगविश्सविसहम सालगुणपिसालिलावा आइसिदअहिलसियका श्याण कप्पललियंगुनासहिंमरेविसवतरण जाउ उईवजालंधुमडत पउतारपूर्णकदश्साङयवसावमक्काणिसिरिमञ्जमातरमनकू गहवासुदधासिरिसहारामु उपसराकरविणुमुणिवास छह दालिहिणिवाणिधीय पिक्षिमासवणूवसमहोनीयासामयसावमवउकिपिलविहाईदेवत्रणवर अदवि नामणसंलयहरवेवितक हईशारणाहहाभूययक सिरिमइस दरिमशमायाँ आयमदि सिंचपक्वताय जन्दावामरगिरिधिदेहपुरिमिलिएगालणविलविमहे वल्हावश्देसरसासमिद्धा होत उनखानामणगिडुगडणारयहादरसायरसमान अणुजविपकप्पस्वराउ णिवणवरणियटोपलव स्वामिश्रेष्ठ, मेरे गत जन्म थोड़े में बताइए? और भी हे यति श्रेष्ठ, इस चक्रवर्ती की पुत्री तुम्हारी माँ के आनन्द आये. तुम बज्रजंघ मेरे पिता। भव-भाव से रहित वे मुनि फिर कहते हैं-तुम श्रीमती का जन्मान्तर (चार पुरोहित मतिबर धनमित्र और अकम्पन अनुचरों का चिरजन्म बताइए और मेरे भारी स्नेह का क्या कारण है?" पूर्वजन्म) सुनो । गृहपति की पुत्री धनश्री श्रुतधारी मुनिवर को उपसर्ग कर बनिया की दरिद्र कन्या हुई। मुनि इस पर मुनि कहते हैं कि ऋषि के द्वारा कहे जाने पर भी ज्ञान से रहित जयवर्मा नाम के हे सुभट ! तुम निदान पिहिताश्रव ने उसे उपशान्त किया। वह कुछ श्रावक व्रत ग्रहण कर स्वर्ग में तुम्हारी देवी हुई स्वयंप्रभा नाम बाँधकर विद्याधर राजा हुए, सेना से सहित महाबल नाम के। की। वहाँ से आकर यहाँ राजा की कन्या हुई श्रीमती सती सुन्दरी मेरी माँ । हे तात ! अब भृत्यों के पूर्वजन्मों घत्ता-प्राचीन समय में विजयार्ध पर्वत पर अलका नगरी में स्वयंबुद्ध के द्वारा सम्बोधित विशुद्ध मतिबाला को सुनिए। जम्बूद्वीप के सुमेर पर्वत के पूर्वविदेह में वत्सावती देश है जिस पर सदैब बादल छाये रहते हैं, और शीलगुणों से प्रसाधित वह विद्याधर राजा मर गया॥१४॥ उसमें क्रोध से प्रज्वलित गद्ध नाम का राजा था। वह बेचारा नरक गया और पंकप्रभा भूमि में दस सागर पर्यन्त दु:ख भोगकर जहाँ धन का निवास है, ऐसे अपने नगर के निकट, तुम ललितांग नाम से ईशान स्वर्ग में देव हुए काम की अभिलाषा करनेवाले। वहाँ से मरकर तुम यहाँ १५ For Private & Personal Use Only Jain Education Intern www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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