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________________ सवनवसंधारविससविना तातणनिलहतिंनिमियअहिदिविमुखगखमहासंघावियसहा साणिनभयहासमकिणिणावश्याणियामहिकपहाडनहोमशणया टोपविणदणमणिगुरुवित हिउवयमग्नंववासिठसयसहिदासहंश्चयहिविज्ञाहरहि नरूकाहरगिरिविवरंतरहितही चिषतणाकणयावलिया चिरसंचिमडरियावलिगलिया कालणवहतमदिहरहा युपयतमाला संघपुतहासापाणियाणपरिरकमरूपाणण्जातियामिदवसायनां जीवियम्वाससायरस मणकालॅसचालिस क्षादसंडावहिलमालामगिरितरुमालियनवजातस्यावरा विदहंगधिलविसथम्भिविमुक्कवियिया नमानयरिता प्रौधरमजानियत्र पअयम्भुणरसरुममाहाधियानातदेववविधरंदला ककुरासुदेश्दीन लीशा इमण्ड अनियतममालहठ दिखहकारणेना लग्निवटजणांग्रहिणणुमनिक तदिन्च म हावय मुकारितणस्तक्लियज्ञमयनिजियसाहणा ममाइपलायासविषयहागुयायायावलसवडा इरधरेविकरमहंगठिहणीसरविहोर्कणसिवीगउसि २२३ विषय-विष भव-भव में संहार करता है। तब उसी ने इस बात को ग्रहण कर लिया। सुरवरराज का अभिनन्दन कर विद्याधर सहसा अपने नगर आ गया। डाइन के समान योद्धाओं का भक्षण करनेवाली अपनी भूमि, अपने उसके पश्चिम विदेह के गन्धिल्ल देश में, अप्रिय चीजों से मुक्त अयोध्या नगरी है। उसका राजा जयवर्मा पुत्र महिपंक को देकर मुनिरूपी गुरु के द्वारा बताये गये उग्र व्रतमार्ग में अपने हित के लिए व्यवसाय करने है और उसकी प्रिया सुप्रभा है। वहाँ से आकर वह इन्द्र उन दोनों का पुत्र हुआ, अजितंजय नाम से विजय लगा। तरु कोटर-गिरि-विवरों में रहनेवाली बहुत सी विद्याधरियों के साथ उसने कनकावली व्रत ग्रहण कर प्राप्त करनेवाला। राजा दीक्षा के पीछे पड़ गया। पिता ने (मुनि) अभिनन्दन से याचना की। उन्होंने उसे पाँच लिया। और उसकी चिरसंचित पापावलि गल गयी। समय बीतने पर उस महीधर का अन्तकाल आ गया। महाव्रत दिये। उसने सातों भयों को छोड़ दिया। मृगों को विजित करनेवाले सिंह से जैसे सिंह नष्ट हो जाते प्राणियों के प्राणों की रक्षा करनेवाला वह राजा प्राणत स्वर्ग में देवेन्द्र हुआ। हैं, वैसे ही उसकी भी इहलोक और परलोक की आशाएँ नष्ट हो गयीं। कठोर आचाम्न तप का आचरण घत्ता-वह बीस सागरपर्यन्त वहाँ जीवित रहा और काल के साथ वह वहाँ से चला। धातको खण्ड कर कर्म की आठों गाँठों को नष्टकर वह शिवी होकर, शिवपद के लिए चला गया। में तरुओं से आछन्न जो पूर्व मेरु है ॥११॥ Jain Education Intematon For Private & Personal use only www.jansar
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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