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________________ शाशवजवाकयामतहिणारखशारिहिण्जपपरमिउसखजासुकितिगमदियहिंदिवंतर्दिवाढीवर वज्ञवाऊराजावसु दिक्वरिदंतहिं जासखरखनीरववियसि जासुजणापरहिणिससिडजा धराराणीबजाजध सकारचाएगापवतिट जेणनिजयुराकटुवाचति जागाधम्मण! पुत्र। जोन जेपचिचनिणययजएटादन यम्मसासवासालवधार तोवर अहमदएविवसंवरिलमहोगनवाअवयखिम पवमासर्दिन्यरहो। सासरिखतदितणमणिटाउललियंगणदणुणणखेसांगठाला डिलहिक सहिउजयानदि रहसहिजघहिदाहरणेतदिकिसमझण थोरलयकायले वियडेंकडिमलेपछयल सतपाहियरंगशार वनश साहित्रायाः कोमल पनदियकामलहकाहि अवरहिमिलकणहिस दिधिशालकाजवतियापकदिविदिणाअकयाविहायनाव:दियकरचरणयखावजसंघ वजोताकाटाठावासोकमारुताहवाटावाणवरासाणकालातहास्यश्सयाचियक्ति हालसाहाणसहासिमझसरमाणसादाहसमलायविनायनाविणादणणिस्चराजाथनाहाका हमकिकिराबदिापश्मरणविकहपाडल्लदि हाउगुरुगाश्यनपशारमणविषोमवकिपिणारच कटितल और वक्षःस्थल से नाभि शोभित था। गम्भीर स्वर, छत्र के आधारस्वरूप शिर, कोमल चरणों और उसमें वज्रबाहु नाम का राजा है, जिसने वैभव में इन्द्र को मात दे दी है। जिसकी कोर्ति दसों दिगन्तों परुष हाथों तथा दूसर-दुसरे प्रशस्त लक्षणों से जोमें फैल गयी है और श्रेष्ठ दिग्गजों पर आरूढ़ है, जिसकी तलवार से शत्रु का अन्त हो चुका है, जिसका राज्य घत्ता-लक्षणों के समूह को बिना कोई विभाग किये विधाता ने एक जगह पुंजीभूत कर दिया था। वज्र शत्रु के द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता, जिसका कोश त्याग से पवित्र है। जिसने त्रिजग की अपने कुटुम्ब से अंकित चरणकमलवाला वन समान शरीर वह वज्रजंघ था॥४॥ के समान चिन्ता की है, जिसने अपने कुल को धर्म से उद्योतित किया है, जिसने अपना चित्त जिन-चरणयुगल में लगाया है, जो उसकी वसुन्धरा नाम की देवी है, जो प्रेमरूपी धान्य के लिए वर्षायुक्त भूमि है। (वह जब वह कुमार वहाँ बढ़ने लगा, तभी उस केवल ईशान स्वर्ग में, प्रिय के विरह से पीड़ित स्वयंप्रभा ललितांग) स्वर्ग से उसके गर्भवास में अवतरित हुआ और नौ माह में उसके उदर से बाहर आया। उससे विलाप करती है, मुझे मानसरोवर अच्छा नहीं लगता, हा! स्वर्गलोक फीका पड़ गया है, स्वामी के बिना वज्रजंघ ने ललितांग को पुत्ररूप में जन्म दिया जो मानो मनुष्यरूप में कामदेव था। धुंघराले बालों से ऋजुक मैं परवश हो गयी हूँ। हा कल्पवृक्ष ! तुम क्यों फूलते हो, पति के मरने पर कष्ट मुझे छेदे डालता है। हा तुम्बरु ! (सीधा-सरल) शरीर था। वेगशील जाँघोंवाला, दीर्घ नेत्रवाला था। क्षीण मध्यभाग, स्थूल भुजयुगल, विशाल तुम्हारा गायन पर्याप्त हो चुका है, प्रिय के बिना मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। Jain Education International For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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