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________________ बातोपिवयममुररमणिममाणदिशिडकाविलणालागायण किंकाररमणिकंकणसएण अस्किार दछनएकजीवावलमलठसाटऽहळितविधिवलम्चपोरिसमसण आणेजसुषियमदरख सपावड़कावलणश्यहावसतारूविज्ञपसागणद्विारुघड़करणिन्निसहतिपदिारवाह रिघुममातिपहिहकिनिलयाश्वसमियो क्वजमिदाहसिपहसगि बडकाविलणश्माह माहामविज्ञहिदिवाकरणारिनचामरपियंग्वधारकरि आणेशासायसमसेयहारि बलकाविर लणश्यहिमाणगाहें लग्गजसपियपडिबरकमाहो जिगणदएणविनबिलाडागडुगणहानासन पराङ जिममिटिहातिमहिमयरहासिउश्यणाहरणजसदेचडबडकाविलणणासंकया तापियपिसणश्याविमजया घना कश्याकमगाहा जणडणमबलद्यगोदले मिश्यांश सुजातासकिनिदिध्महिमरले २ तारायाणणरणतरलरका किर्किकरकरायशतासि यविवरकाई सरदंतिमहलमतलनिदिणिणायागयोगरगट्यागसदिमघाखापडपटमा लमहारावरोलाई किकिरकरस्त्रमियसलललियतालाई मुदपवाणयादरम्यूयिकादलझंगडतर लिगहिंहलमहलालाई तडिवणतडयटियखरकरडटिविलारी विसंतालरिसरामरियसलाई ना सासकारणपूरिटाशिधमलाई हृदयंताऽवसंखजसलाई अवरापनमाध्यरियलियरीखाजय १६॥ २ तो हे प्रियतम, सुर-रमणी को मत पसन्द करना"॥१॥ कि निशंक दुष्टों को सतानेवाले ही जय प्राप्त करनेवाले होते हैं। घत्ता-जिस कवि ने सुन्दर काव्य में और भट ने महासुभटों के युद्ध में अपने सरल पद-उद्यत पद कोई वधू कहती है-"हाथ में आये हुए सैकड़ों मणिकंकणों से क्या, हाथीदाँत का बना एक कड़ा दिये हैं उसी की कीर्ति महीमण्डल में घूमती है ॥२॥ यदि हाथ में सोहता है, उस धवल कड़े को हे प्रिय ! तुम अपने पौरुष और यश तथा मेरे प्रेम के वश से ले आना।" कोई वधू कहती है-"यह स्वच्छ हार क्या तुम्हारे प्रसाद से मेरे पास नहीं है? तुम्हारे हाथ की तब राजा के आदेश से अनुचरों के हाथों से आहत विपक्ष को सन्त्रस्त करनेवाले लाखों रणतूर्य बज उठे। तलवार के द्वारा उखाड़े गये और शत्रुगजों के कुम्भस्थलों से गिरे हुए मोतियों से कुसुमित अंगोंवाली में ऐरावत प्रलयमेघ और समुद्र के स्वरोंवाले धगधग-गिदुगिदु-गिगि करते हुए आघात दिये जाने लगे। पटु-पटह कीर्तिलता की तरह शोभित होऊँ, तुम मुझे यह भंगिमा दिखाओ।" कोई वधू कहती है-'महिमा का हरण और मृदंग के महाशब्दों का कोलाहल हो रहा था, किंकरों के हाथों से घुमाये हुए सुन्दर ताल होने लगे, मुँह करनेवाले चीर या हाथ से मुझे हवा क्यों करते हो? हे प्रिय रजश्रम और स्वेद का हरण करनेवाला शत्रु का की हवा से तुर-तुर करते हुए काहलों का कोलाहल होने लगा, गूंजती हुई भेरियों के साथ हल-मूसलों के चामर ले आना।" कोई वधूकहती है-"तुम अभिमानी शत्रुपक्ष के स्वामी से लड़ना। छोटे आदमो को मारने बोल होने लगे। बिजली के गिरने से तड़तड़ करते हुए विशाल करट और टिविलि (बज उठे)। बजती हुई में कोई लाभ नहीं, यही कारण है कि राहू नक्षत्रगणों से रुष्ट नहीं होता। वह इसीलिए सूर्य से लड़ता है, झल्लरियों के स्वर से पर्वत उखड़ने लगे। निश्वासों के भार से पूरित विमल और श्रेष्ठ शंखयुगल हू-हू-हू करने इसीलिए चन्द्रमा से लड़ता है, बलवान् के मारे जाने पर यश चन्द्रमा पर चढ़ता है।" कोई वधू कहती है लगे। Jain Education International For Private & Personal use only www.jai337y.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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