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________________ नियडि मजणवासीमागामया गिरतानसास्टिमानायक पलमटियहळद रणमणणिवनियडिमजणवालिणिजहीशारणालं जस्सायाससामिणाखियरमामिणा। विहायरसल्ला णमिबिषमासागामयापिरहनिमाना जाययावसिलागाळाणुनबहहा कुलियताडिउपचकवाइजपउग्धाडिउण्डमालिसाहिनमालायरुपयजएपाडिमण्यामा डर असमुवकिलणसमाएंट एमाणुसुरिन्न ठाणपिलकमंडलमडिटरहनुहोग सुजणतमुणिवरसही चकवाडियएमाणखणाधरुयाङजाङअबलायहिदायरुमा पजालउतासकोवाल माणिहलग्नहारनपवलदामाइयरहिविडिउपायण रपायारुदलिजमाउछलठवश्यदिसमहर हमखुरवयवाणीक्षलार माधावंचमहत महारह माणिसुहंपूखममारह काउकंदलाबालदमविरसठ पलयकालुसापिनमाक रिसठ देहिकप्पणियदाणुहप्पिणु पकलङसाधेपणवपिणु तणिसुणप्णिनाइवलेसाप हिमपिठसूरविदासीन कंदाग्राणदोमिटर ट्रदयकरनिवारिज संकप्पेसोमा इकरपण पंडशिवणिरालिया श्रारणाला इंदिमठमसिणाइरिक्षणासिणगार दसमन्तातमहालादयसासणाकुलविहसगाहाकापडताताकसरिकसरुवरसश्थामा लसुडहासरणमक्षुधरणायल जादहणविवश्साकेहठ किंकदोडकालाणलजह होड करने की इच्छा रखनेवाले राजा के निकट स्नान करानेवालो दामी खनी हो ॥१७॥ दुष्टों के मनोरथ पर न हो। मनुष्यों के कपाल के ऊपर कौआ न बोले । प्रलयकाल रक्त को न खींचे? इसलिए १८ दर्पहीन होकर कर दो, और भावपूर्वक प्रणाम कर भरत से मिलो।" बाहुबलीश्वर यह सुनकर भौंहों के संकांच आकाशगामा नाम विम नाम के विद्याधर स्वामा हृदय में शल्य धारण कर, बिना किसी क मटके से भयंकर होकर बोलाजिसके वशीभूत हो गये जिसने फिर विजयाध पर्वत को बज से आहत किया, जिसने पूर्वाकवाड़ का उद्घाटन पत्ता-"में कन्दर्प (कामदेव। हूँ. अदर्ष ( दर्पहीन) नहीं हो सकता। मैंने दृत समझकर मना किया। किया, जिसने नृत्यमाल को सिद्ध किया और मालाकर का एक प्राकृतजन की तरह अपने दोनों पैरों में गिरने मेरे संकल्प से वह राजा निश्चित रूप से दग्ध होगा ॥१८॥ के लिए बाध्य किया। उसके माथ असम (विषम। वेर क्या, जो कश्वमुख मनुष्य को रिक्त करता है वह पिच्छी और कमण्डल से मण्डित हाथवाल मनुवर-समूह को भी कोष उत्पन्न कर देता है। वह गुणरूपी मणियों का समद चक्रवर्ती है। आओ भाई को चलकर देख। उसके क्रोध की आग न भड़के और तुम्हारा पापों को नाश करनेवाले महर्षि ऋषभ ने जो सीमित नगर देश दिये हैं वह मेर कुलविभूषित लिखित बाहर्बल न जलं, हा तुम हाथी के दाँतों में विभक न हो, पाटनपुर के परकोटेनाप न हो, दिशा की मयांदाओं शासन है, उस पभुच का कौन अपहरण करता है ? सिंह की अयाल, उत्तम सती के स्तनतल, सुभट की शरण को आच्छादित करनेवाला, बाड़ों के खुर्गा से मन भारती का बुल समूह न उछल्ले, महान महास्थ न दौड़े, और मेरे धरणीतल को जो अपने हाथ से छता है. मैं उसके लिए यम और कालानल के समान है? For Private & Personal use only www.jainelibrary.org ११ Jain Education International
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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