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________________ पवहिपश्पडियामा तीजकागतोन्ह मिला अमानुपदश्टवरियगश्तणिसणेविलासि यठ अप्पाजमविणासियत मकवाणाच्यणुणिरसियत तसहिचंगठववासिवान जिह मउडुनयमूडामपिणा चिया महादरणकाणणा तिहावामिविसमणिपालदिखव रणयशिपिटाराधना जिणवादादा बलवंतहोरिट्रियमाणाडो पमिविणामासरहिंप डिवापसवणरणाहहोणरायहाकपावियतिङयणही पायपिणगयसपिहलपहा तव धवसिधिवपडववि रणवीरवणहदनि संचवडाबश्धरणलख उद्धरियसूलकर वालहल्लु मस्चलियललिचलचिंधव युददायारणमाञ्चलु पदपकपश्फाणे पिशवलापकवणवतियसबकापटगुणधियश्याहाणु परिचालश्लोलपसरण महामन्चऽसहकरिडथवश्वकश्कवहरितदादाणफेर्णिसमिदाय चिकिल्लएखालए। खतपमानाचिदिणपढिाहिं जमदवाणिधासहि गड़गिरिविवरु वजातट्रिपडहसर हासद्दिामाजपरावणविपलिव्हिटाउणिहियउचडरावकागणितपमापदापमाहा याधावियाराविहिदाग उजागाजायजल वारुवारमारियपुलमासकमका मेपजिसचण्डलसरिखठसरियउछत्तखतकवहरहोणिग्नयउ केलासगिरीसकलनगदवास १५१ कदाहोर यदि इस समय आप इन्हें देते हैं तो हम इनका भोग करते हैं, नहीं तो आप ही इनको ले लें, हम फिर दिगम्बर में सैन्य नहीं समाता। नागसमूह काँप उठता है परन्तु कुछ कहता नहीं। प्रभु चलता है, देववधू नृत्य करती दीक्षा ग्रहण करते हैं।" यह सुनकर राजा बोला, "जो तुमने अपनापन नष्ट नहीं किया, मेरे आज्ञावचन को है। पैर जमाती है, आभरण ग्रहण करती है, घूमती है, साड़ी हिलाती है। हाथी धीरे-धीरे चलता है, और नहीं टाला, यह तुमने अच्छा किया। मुकुट में उत्पन्न है चूड़ामणि जिसके, ऐसे महादरणीय धरणेन्द्र ने पूर्वकाल शब्द करता है, रथ रुक जाता है, और घोड़ा गर्दन टेढ़ी करता है। गज के दान (मदजल) और घोड़े के फेन में जिस प्रकार समर्पित किये थे, उसी प्रकार मैं भी समर्पित करता हूँ, अपने प्रिय विद्याधर नगरों का तुम से रज शान्त हो जाती है। परन्तु कीचड़-भरे गड्ढे में पैर फँस जाता है। पालन करो।" पत्ता-वन्दीजनों के द्वारा पठित जय हो, प्रसन्न रहो, बढ़ो, आदि शब्दों के घोषों और बजते हुए सहस्रों घत्ता-इस प्रकार नमि और विनमीश्वर के द्वारा जिनवर के पुत्र बलवान् और ऋद्धि से सम्पन्न नरनाथ नगाड़ों से गिरिविवर गरजने लगता है ॥१८॥ भरत की सेवा स्वीकार कर ली गयी ॥१७॥ १९ १८ लोग पीड़ित हो उठते हैं, परन्तु मार्ग समाप्त ही नहीं होता। तब मनुष्य के द्वारा लिखित सूर्य-चन्द्र रख वे दोनों त्रिभुवन को कैंपानेवाले राजा को प्रणाम कर अपने घर चले गये। लक्ष्मी के स्वामी अपने उन दिये गये, अन्धकार के विकार को नष्ट करनेवाली मट्टिय कठिन कागणीमणि के द्वारा उजला प्रकाश कर दिया दोनों भाइयों को भेजकर तथा युद्ध में धीर शत्रुओं को नष्ट कर जिसने शूल, करवाल और हल उठा रखा गया। स्कन्धावार और वीर भरत पुलकित हो उठा। वह सेतुबन्ध के द्वारा क्रम से चलता है और जल से भरी है और जो हवा से चलते-उड़ते चंचल ध्वजोंवाला है, ऐसा सैन्य चलता है, धरती हिल जाती है। उधर गुहाद्वार हुई नदी पार करता है। उस पर्वत की गुफा से निकलकर शीघ्र ही वह कैलास गिरीश पर पहुँच गया। Jain Education International For Private & Personal use only www.jaine3010g
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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