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________________ एस्वचलनुपहे सिंधुमहापदारुपराला अवलोश्यगणसिंधुकिहाविञमधारिणिवखेसजिह दावमयपावश्हाळघड विवासियाविसंगदियजडागिरितवासदेण्परिघुलियजडारणावात वसादासपथडअपकडिलपासमतिमऽमलगसिणिणपंचमिटरगश्चएलहिवदासश्सरा वसरवकरायल्सपियपाइभरकमलणकोसलचिवधरजामदिवसालापहरश्चलसार। मजबलपहरियाणश्नपरिकतिहिंदरिय गतवयावलिण्डुस्थि पवहनखसमयपिंजर रियाणंगहियविचिनवरुनरिया अहवाणंमंडणकवस्थि गयव्यर्थदणरसपरिमलियाचदछक लावसुर्कोतलिय जामिलिसगपिरयणायरहो रन्नाधुनिवखणायदोमिलाताहतारमुक्क उसिमित तामहरिसिहरसंपन्तक वारुणदिसिकामिणि शिवडिठमिश्चणिगरिउन्नठान अमिणदिणसरजिहसठण तिहपंथियथितमाणिमसठण जिहादियठदावउदितियउ तिह कंताहरणहदित्तिय सिहसंयारागरंजियन तिहदेसारारजिमठ जिवल्लनसंताविमठ नि हयकमलविसंताविमन जिदिसिदिसितिमिरमिलियाई तिहदिसिदिसिजारइमिलिया जिद यणिहकमलमलियां तिहविरहिणिवमणईमलिमजिधरहिंकवादियाज्ञजिहा दणियकरपसरुकिजातिहपियकसहिंकरपसकिन जितकवलयवेयमवियसिप तिहकाल, ८ सन्य रास्त म चलता हुआ सिन्धु महानदा क द्वार पर पहुचा॥६॥ वाला जा जाकर रत्नाकर स उसा प्रकार मिल जाता ह, जस प्रकार काइ स्त्रा नागरजन सामल जाता है। घत्ता-उसके किनारे भरत ने डेरा डाला, इतने में सूर्य अस्ताचल पर पहुँच गया। मानो पश्चिम दिशारूपी भरत ने सिन्धु नदी को इस प्रकार देखा, जैसे विभ्रम को धारण करनेवाली वरवेश्या हो । जैसे मद का प्रदर्शन कामिनी में अत्यन्त अनुरक्त मित्र (सूर्य) गिर पड़ा हो॥७॥ करनेवाली हस्तिघटा हो, विबुधों (देवों/पण्डितों) के आश्रित होते हुए भी जिसने जड़ (मूर्ख जल) संगृहीत कर रखा है। वह वन की आग की तरह है जो परिघुलियजड (जिसमें जड़ नष्ट हो गया/जल घुल गया है), वह दिनेश्वर के अस्त होने पर जिस प्रकार पक्षी स्थित हो गये उसी प्रकार शकुन को माननेवाले पथिक भी बुद्धवृत्ति झसपयड (जिसमें प्रकट है मछली और तलवार) की तरह शोभित है। जो मानो बृहस्पति की मति स्थित हो गये। जिस प्रकार दीपकों की दीप्तियाँ स्फुरित हो उठी उसी प्रकार कान्ताओं के अधरों और नखों की तरह अत्यन्त कुटिल है, जो मानो मोक्षगति की तरह मल का नाश करनेवाली है, जो धनुर्यष्टि की तरह मुक्तसर की दीप्सियाँ भी। जिस प्रकार सन्ध्याराग से लोक रंजित हो उठा, उसी प्रकार वह वेश्या राग से। जैसे विश्व (मुक्त बाण और मुक्त तीर) है, जिसके लिए धरा की तरह अनेक राजहंस (श्रेष्ठ राजा और हंस) प्रिय हैं, जो सन्तापित हुआ, उसी प्रकार चक्रकुल भी। जिस प्रकार दिशा-दिशा में अन्धकार मिल रहे थे, उसी प्रकार दिशाकमल की तरह कोशलक्ष्मी को धारण करती है, जो राजा की शक्ति का अनुसरण करती है, चंचल सारसरूपी दिशा में जार मिल रहे थे। जिस प्रकार रात्रि में कमल मुकुलित हो गया, उसी प्रकार विरहिणियों के मुख मुकुलित पयोधरों को धारण करनेवाली जो शुक के पंखों की कतारों से हरित है (हरी है) खेलते हुए बलाकाओं से जो हो गये थे। जिस प्रकार घरों में किवाड़ दे दिये गये थे, उसी प्रकार प्रियों को आलिंगन दिये गये थे। जिस सफेद है, बहते हुए कुसुमों के परागों से जो नीली है, मानो जिसने विचित्र श्रेष्ठ उत्तरीय धारण कर रखा है, अथवा प्रकार चन्द्रमा अपनी किरणों का प्रसार कर रहा था, उसी प्रकार प्रिया के केशों में करप्रसार किया जाता था। जो श्रृंगार के कारण रंग-बिरंगी है। गज, अश्व के चन्दन के (लेप के) रस से मिश्रित और मयूरपिच्छों के कुन्तलों जिस प्रकार कुमुद कुसुम विकसित हो गये, उसी प्रकार । For Private & Personal use only www.jainelibrary.org Sain Education Internation
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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