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________________ राष्ट्रात कवति इसयास गंगा तेरे ॥ डर वगुवरंगस्य करिरयप्पुलोह वलयं करवाणु उम्गमिठं या हंगणे इमणिखण। आरुढन संद अल्सिराणु क अवयणरहिंस दहर गेमा Jain Education International णसपकपण्या | हंस पदरापर पुष्ममदामहंतु। परिलमिलच्छ विचारुदेव चल मंत्र वमध्य वडा जलड | पाणामा गिकिरणपालन उलंवियकिंकिणिरणमा शुक के रंगवाले अभंग अश्वरत्न, और लौह श्रृंखलाओं से अलंकृत गजरत्न की (पूजा की। आकाश में सूर्य निकल आया। वह पुरुषरत्न (भरत) अपने रथ पर आरूढ़ हो गया। वीरों के द्वारा प्रशंसनीय, कतिपय मनुष्यों के साथ, (मानो जैसे मानसरोवर के पंक में राजहंस हो) प्रहरणों (शस्त्रों) से परिपूर्ण, अत्यन्त महान् नियसिदद्धमणे विलडनु सलिललि दिसलि देससाधना रिवऋति न्यच डिज For Private & Personal Use Only ११८ घूमते हुए रथचक्रों से चिक्कार करता हुआ, चंचल फहराते हुए पंचरंगे ध्वजों से सुन्दर, नाना मणिकिरणों से आलोकित लटकती हुई किंकिणियों से रुनझुन करता हुआ, देवेन्द्रों के मन में भय उत्पन्न करता हुआ, वह रथ, जिन्होंने समुद्र के जल में अपने पैरों को धोया है, www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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