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________________ माणवणिवाहिँ अणिमिसर्हिणाक्षणेदि ससिसामन्यणहिँ विनिमतादेटिं यरुष्पदावहिक पायवायलेबाजाबतिखणेदेव पारकाध्यमाशेणसिराठरोमाईरतापिताशणपुरीसमुन्ना मासिबउमासाई णवलासकेसाई मलिकयुक्ताई पाठ्यकिबुक्काशसाह्मागहम्मदेवापदे हामानवहरकवादर्शिसईहॉतिविण्डा हरिसणगीति सहसतिपिग्गति सजोणिसंमुड हा मषिकिरणपामडहो जयदेवदेवदाजयणादचिरुणदएपछासतिपरियणाईनसंतिीस बहमितणुमाण उहिहनियाणाणला असुरईपणुवीस रहससाहावितरहंदहहादीहनु। सतनिधाणुजोइसमुरडा विहिरयाणीउसनविहिकहरुण पुणुचकपचसमुपसुख्यण यु एचई मिचत्रारिलिगायत पुणविवाहजिविहिणायन तिलषयरयाण्ठिसविअप्पहिं दहा पेचमसालसम्यकपर्दि दाणअहपढमगवज्ञहिमशकिरददामिजगमनहिं हाजदियद्द यणिउवरिलदे अमरवादिपरमाणुरहिलोणचाणुनरहमिसार एकजिल्यणिपनतुस रारायणिमामहिमालघिमापन्निह ईसन्नण्वसितमश्सन्निहिं जातकामवेंकामामरकाला लोललालसयलामरणनखुजमवावणचडईडनाणारीप्ररिसजिणवतयंडय अाझेसाणका मानवी आकारों, अपलक नेत्रों, चन्द्रमा के समान सौम्य मुखों और सन्तापशून्य पुण्य प्रभावों से स्वर्ण के समान विकार से रहित देव एक क्षण में उत्पन्न होते हैं । सौधर्म स्वर्ग के देवों के शरीर में नखचर्म और सिर (वैमानिक देवों में) सौधर्म और ईशान इन दोनों स्वर्गों में शरीर की ऊँचाई सात हाथ, सनत्कुमार और में रोम नहीं होते। न रक्त न पित्त, और न पुरीष और न मूत। न मसे, न मांस और न दाढ़ी केश होते हैं। माहेन्द्र स्वर्ग में छह हाथ, फिर ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर, लान्तव और कापिष्ठ स्वर्गों में पाँच हाथ ऊँचे देवजन होते न उनके मस्तिष्क में शुष्कता होती है और न कलेजा (यकृत) होता है। उनके वासगृहों के किवाड़ स्वयं हैं। शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्त्रार स्वर्ग में चार हाथ, और फिर आनत और प्राणत स्वर्ग में साढ़े तीन खुल जाते हैं । (इस प्रकार ) मणिकिरणों से आलोकित देवयोनि-विमानों से देव अचानक निकल पड़ते हैं हाथ होते हैं: आरण और अच्युत इन दो स्वर्गों में तीन हाथ । प्रथम ग्रैवेयक (अधोग्रैवेयक) के विमानों में और हर्ष से उछलने लगते हैं, "हे देव-देवेन्द्र, आपकी जय, हे स्वामी, आपकी जय। आप प्रसन्न हों" यह (३) ढाई हाथ: विश्वपूज्य मध्यम गवेयक के विमानों में दो हाथ। ऊपर के अर्थात् अन्तिम ग्रैवेयक के तीन घोषणा करते हैं और परिजनों को सन्तुष्ट करते हैं। इन सबके शरीरों का मान जिनज्ञान के द्वारा निर्दिष्ट है। सुखद विमानों और (अनुदिशों) के देवसमूह का परिमाण डेढ़ हाथ, विजयादिक पाँच अनुत्तर विमानों का घत्ता-भवनवासियों में असुरकुमारों की ऊँचाई पच्चीस धनुष और व्यन्तरों सहित शेष देवों के शरीर श्रेष्ठ शरीर एक हाथ-प्रमाण कहा गया है। अणिमा, महिमा, लघिमादि शक्तियाँ ईशित्व, वशित्व और गतिशील की ऊँचाई दस धनुष तथा ज्योतिष देवों के शरीर की सात धनुष है ॥२४॥ के द्वारा, युक्त कामरूप से आतुर समस्त देव क्रीड़ा से चंचल लीलावाले होते हैं। वे कुबड़े, वामन, न्यग्रोध संस्थानवाले और हुंड (विकल-अवयववाले) नारी-पुरुष और नपुंसक नहीं होते। च्युति (च्यवन) पर्यन्त देवांगनाओं के साथ गमन आदि ऐशान स्वर्ग तक सम्भव है। For Private & Personal use only www.jainelibrary.org JainEducation International
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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