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________________ गाएगनश्चम्मच जोपहरदोमाणदेचातहाविडश्माणकसाईत णिजियवासमय यूताशपखाशवदोतणउन्नरायडिलाहयतश्ययुथरहरति अविहंडिनमाण्ड वहाता वियापहाइ सियाण्ड दासश्चनादिसहिमुहारविडावारहकाडेसविजेवर्सतितितमकमका सम्मुहरुपति घना मल्लियकलापणविवासिरल सर उगवविमुक्किय परिवाडिएकोहि विडियट सहिपधाउपछि वडव गागहरकणवासिसुरमणि अजियसंधुग दविउवापणिवासदेवाणविसावणितरपिसतानासुपदहकमारवितरसरिंद गुपोश्सर कप्पामरणरिद अतिरिसफरियदाढाकराल केसरिजरसहलकाल बरीतिगणेसाक्ष्यको ण शिणलनिवासियसमेण पावणवपंचविढियहि सहहिसचिमाणानढएदि साहासा, पमिल्लविखश्यलाउ अहमिदहिथुडविराट जसरवितासियजगपकादिग्धोसियकलपा मिकाहिंसाहाराणमडाबलिवियमहिटलहिं घोलतकुसुममालाचलेनिवागागादाखंध्य हिं नहास्टिललियधुझसहि संथनमाहामीसाणहि अविरहिंमितियसपहाणपहिघिका इयडामहवमहाणिमहणा दासगसपसपाससिदिजयसयलविमलकेवलपिलयाहरणकरणद्धा धर्मचक्र उनके आगे-आगे चलता है। जो दूर से भी मानस्तम्भ को देख लेता है उसके मानकषाय का दम्भ देव और नरेन्द्र। फिर तिर्यच। विकट दाढ़ों से विकराल सिंह, गज, शार्दूल, कोल और गणधर आदि क्रम नष्ट हो जाता है। जिसमें अनेक मतों के तर्कों को जीत लिया गया है ऐसे उत्तर परवादी भी नहीं देते। प्रतिभा से बैठते हैं, जिनभक्ति से भरित और श्रम से भूषित। नव-नव पाँच प्रकार से प्रसिद्ध अपने-अपने विमानों से आहत वे भय से काँप उठते हैं और अखण्ड मौन धारण करते हैं। अविकारी, अपनी प्रभा से पूर्ण चन्द्र में बैठे हुए अहमिन्द्रों ने राग को ध्वस्त करनेवाले सिंहासन छोड़कर जिनेन्द्र भगवान् की स्तुति की। अपने को फीका करनेवाला उनका मुखकमल चारों दिशाओं में दिखाई देता है। बारह कोठों में जो बैठते हैं वे यशरूपी सूर्य से विश्वरूपी कमल को खिलाते हुए, अपने कुल का नाम और चिह्न बताते हुए, मुकुटों की कहते हैं कि मुख मेरे सामने है। कतारों से महीतल को चूमते हुए, पुष्पों की चंचल मालाएँ हिलाते हुए, गाथा और स्कन्धक गाते हुए, सैकड़ों घत्ता-हाथ जोड़े हुए प्रणत सिर गर्व से रहित स्वच्छ, नष्ट हो गये हैं पाप जिसके, ऐसी प्रजा परम्परा सुन्दर स्तुतियों का उच्चारण करते हुए सौधर्म और ईशान इन्द्रों तथा दूसरे देवप्रमुखों के द्वारा उनको स्तुति के अनुसार कोठे में बैठ गयी॥३॥ की गयी। घत्ता-दुर्मद कामदेव को जीतनेवाले दोष और क्रोधरूपी पशुपाश के लिए अग्नि के समान समस्त विमल गणधर कल्पवासी देवों की स्त्रियाँ । आर्यिका संघ, ज्योतिष्क देवों की स्त्रियाँ; व्यन्तरदेवों की स्त्रियाँ, केवलज्ञान के घर और मिथ्यादर्शनादि का अपहरण और सम्यक्दर्शनादि का उद्धार करनेवाले हे विधाता, और भवनवासी देवों की देवियों की पंक्ति। फिर दस कुमार, फिर व्यन्तरेन्द्र । फिर ज्योतिषदेव, कल्पवासी आपकी जय हो॥४॥ Jain Education International For Private & Personal use only 181 www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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