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________________ णाचार्मगुरुसोजेणतणसासणाठासणिजिणुणमिठयणवंतसीसेण तासदिययम्मिरक्कमपण इसातसविमजगणालगुन्हयमलिणुरिसिठसत्रसगणतणुतायणिवसवयरण तवदारणाप्तावे णखतापमलहरषु मलहरणसंसवश्केवलमहाणाएं लयविरमुसुङपरसुजजाज्ञपिताणचित्तान याचतेचिसोथक पत्तोपविसुहाविससेदसवसण सेयसयरलहनामालायचकस्सहाश्तव मिछवणणाही कणसवंतरम्मिचिष्मातवोधमोहाला धकलहायकत्तगज्ञाणित करुणादिपन्ह किठयाणिजसससिलथवलियम्सें पयपत्कालियासिरिसयसे वंदिउपायतोनमुहगारठा जमाजरामरणावहार ईदचंदणादपियार उहासणिसणिहिलसदार कुसधारठिकल्लि असारहि चंदणकमहिंधासारहिं पयसंमलियहितहिंकुमारहि पयसिंदूरहिमंदारहि कुल्ल हिंकलेधकारहिं अकयाहिंदहगंधपयारहिं दावयवात्रहिवंगारहिं करमरमाकलिंगा मालरहिं अंदमहलाहिंजवजवारहि पष्पर्दिश्यफलकपरहिं तरनिहनुवम्मणियलाउला निमयरमहिपमजमलमा सूप्पणिवाटकरणिपुलाचे जाखंडितरणचम्मङचावें जश्वरतवसदारी सिबलगें जोषाधणुहेणणिहिचणागे सोनछुरमुणियारियहोसहोणसम्मुलंपिठयतबद्धवास आये हुए उन गुरु को मस्तक झुकाकर 'ठा' (ठहरिए) कहा। रतिरूपी कुमुदिनी को सन्तापदायक विश्वकमल के श्री श्रेयांस ने पैरों का प्रक्षालन किया और जन्म, जरा तथा मृत्यु की आपत्ति का हरण करनेवाले शुभकारक को खिलानेवाले हतमलिन बह ऋषिरूपी सूर्य अपने मन में सोचते हैं कि आहार से शरीर है, उससे तपश्चरण चरणजल की वन्दना की। इन्द्र, चन्द्र और नागेन्द्रों के लिए प्रिय आदरणीय ऋषभ को ऊँचे आसन पर बैठाया का निर्वाह होता है, तपश्चरण से ताप और क्षमा से पाप का नाश होता है। पाप नष्ट होनेपर महाज्ञान केवलज्ञान । गया। उछलते हुए हिमकणोंवाली जलधाराओं, भ्रमरों की गुंजार से युक्त सिन्दूरों और मन्दारपुष्यों, नाना उत्पन्न होता है, और उससे अविनश्वर परम सुख होता है और मुनि निर्वाण-लाभ प्राप्त करता है। गन्धवाले अक्षतों, दीपक चरुओं, धूपांगारों, करमर माडलिंगों और मालूरों, आम्रफलों, जम्बूजंबीरों, पत्रों, घत्ता-इस प्रकार विचारकर तप से विशुद्ध पात्र वे वहाँ ठहर जाते हैं। और पुण्य विशेष के वश से पूगफलों और कपूरों से, नूपुर के समान कामदेव की श्रृंखला से च्युत, परमेष्ठी के चरणकमल की पूजा की। श्रेयांस उन्हें पा लेता है ॥९॥ फिर भावपूर्वक प्रणाम कर यतिवरों के तप में भंग का प्रदर्शन करनेवाले कामदेव के धनुष के द्वारा जो पुनः छोड़ा गया, और जो फिर से कामदेव के द्वारा धनुष पर नहीं धारण किया गया ऐसा वह इक्षुरस, मानो दोषों इसप्रकार भुवननाथ किसके भवन में ठहरते हैं, जन्मान्तर के अमोघ तप को किसने पहचाना। कुरुनाथ का निवारण करनेवाली तपरूपी आग में उपशम भाव को प्राप्त हुआ। ने नवस्वर्ण के घट के भीतर से लाया गया पानी छिड़का। यश और चन्द्रकिरणों के समान धवलित कुरुवंश Jain Education Intematon www.jainelibrary.org For Private & Personal Use Only
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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