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________________ याशियसूता हम तणुहणाणकाशेणसिमा सोडतोकानिक्रय सुईसयससमाहिविसुहाचार गमनमुनिकरण रुवारजसऽयडिखुद्द दियपाणा संजमुळंडिवि अपाउसालयगहमर हिदिघता। उप्यायधिकवल अधि यलगयमलतधुसुसहनप्रकाहिं पा यालिपडतन पलयहाजतनावणुर सडागरकहिरिमखिंडशा चढवला सुपसाहिएजकमलसवाहिराकुममयरवलखजाम्या हातिदेवदयतययाळामाहजलण जालावालाणरसहिधम्ममहामयजलहवारसहिपाववालक्लाणदिलजकसराश्वकद्दमख तननारहिंपरमपायलयरिंगणडाश्वषाणाचकशामसणिणगयलायतियादेवेंपरहियहि विचिंतिया तार्दिवसाहयणहिंसमहिला तरङमहासेरणयनछिटाउनपत्तलक्ष्यालदिवसमझम बताओ तुम्हारे ज्ञान को क्या ज्ञात नहीं है? अपनी समाधि से विशुद्ध तुम स्वयम्भू हो, यह सुन्दर हुआ जो आप खद्योत हततेज हो जायेंगे। मोहरूपी ज्वालावली को हटाइए, और धर्मामृतरूपी मेघों की वर्षा कीजिए। स्वयं प्रबुद्ध हो गये. इन्द्रिय और प्राणों के संयम को छोड़कर, अपने आपको शीलगुणों से अलंकृत कर- पापरूपी बज्रलेप से लिप्त बूढ़े गरियाल बैल के समान, (भव ) कीचड़ में फंसे हुए तथा रंगनट की तरह घत्ता-अविकल केवलज्ञान को प्राप्त कर गतमल सच्चा सत्व कहिए। पाताललोक में गिरते हुए और नानारूप धारण करनेवाले प्राणियों का उद्धार कीजिए।" यह कहकर लौकान्तिक देव चले गये। दूसरे के प्रलय को प्राप्त इस विश्व को, हे आदरणीय, बचाइए॥१९॥ कल्याण की बुद्धिवाले देव ने विचार किया। उस अवसर पर बुधजनों के द्वारा समर्थित भरत महीश्वर से अभ्यर्थना की, “पुत्र, पुत्र, लो, अब तुम पृथ्वी का पालन करो, आपकी वचनरूपी किरणों से प्रसाधित विश्वकमल के प्रबुद्ध होने पर, हे देव, मिथ्यामत और दुष्टरूपी Jain Education Internations For Private & Personal use only www.jainelibrary.org
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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