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________________ डगधनानिखंदालिकाष्ठसंरुलाबोकवताकमिमलमलमोलाविवालियरसन सवामजिनिहल अलंतरिकिरकणपलाश्ठ साहित्यमापडलपहाड़ाणचमचा लालाजूलाथधिकाराश्यूबठरताविरु सिंसपिनमाख्यदासामलालयामदहि दहलाजघसारमणारभणरायाहसन्नरवरजसकञ्चसुसमुन्ननाघनाकार मथराहमाणिए गंगावाणिपाहाणिनपटाणिउमनश्मतकामकामामामाहामशल मदनसुश्शशाखेडयाइविडतचम्मियलापानीजश्करहश्रमायालाश्रयशमिणमण यन्नय ताहाहाश्यविनमानापंचिदियसहेमणुवायमहो तहोवासवश्कम्मुतवत्तही जाणावरणात पंचपलाउादावियपंडगरणविमालाणवविद्यदसणगुणविणेचारात माझियाणसिहिपडिहारठाडविकजवरणीळगयासयपुवाश्रमकसमयसिधारालिहर वा मोहपानमशाश्वमाहरहावाससमाजिणु दशवविचउगोगामिहिंदकर या उसहडिवाणसविधकरदाचालीसणामुणामकलाविनविनपरिणामासंकन दाक्किमश्ला समुजाललाललागलकालाललाणसाबालतरामचनकाबहाथठालगंडकारिधिारिखदाज दुर्गन्धित, शिराओं के कृमिजाल से संरुद्ध, विपरीत ढंग से क्षरणशील कृमिकुल के मल का पोटला, विगलित इन्द्रियों के सुखों में मन को प्रेरित करते हुए, और तप नहीं करते हुए जीव के कर्म का आस्रव होता है। रस और चर्बी से युक्त अपवित्र यह शरीर है। भीतर इसे किसने देखा? बाहर यह चर्मपटल से आच्छादित ज्ञानावरणी पाँच प्रकार का है, जो वस्त्र के समान आवरण (आच्छादन) दिखानेवाला है; गुणों का निवारण है। नित्य ही मूत्र-लाररूपी जल से चिपचिपा, रोगी, दुर्गन्धित और अत्यन्त सन्तापदायक। वात-कफ और करनेवाला दर्शनावरणी नौ प्रकार का है; जो निर्जित और निषेध करनेवाले प्रतिहारी के समान है। रोगयुक्त पित्त के दोषों का आकर, पृथ्वी आदि चार महाभूतों के समूह का घर ही शरीर है। रमणी के रमण राग के शयन के समान वेदनीय दो प्रकार का है, जो मधुर-सहित और मधुर-रहित तलवार की धार को चाटने के हर्ष से आनन्दित यह जीव अपवित्रता से उत्पन्न चीजों को खाता है। समान सुखद और दु:खद है। मोहनीय कर्म मदिरा के समान मुग्ध करता है, जिन भगवान् उसके अट्ठाईस घत्ता-हाथियों और मगरों के द्वारा मान्य गंगा के पानी में नहा-नहाकर मोह को प्राप्त होता है। मद, भेद बताते हैं। चार प्रकार का आयुकर्म चार गतियों में जानेवालों के द्वारा पहुँचता है और खोटक के समान काम, क्रोध, माया, मोह से अपवित्र यह शरीर शुद्ध नहीं होता ॥१२॥ वहीं अवरुद्ध होकर रह जाता है। नामकर्म बयालीस प्रकृतियों का होता है और वह चित्र के रंगों की परिणति के समान परिणामों से युक्त होता है। कुम्हार के बर्तनों के समान छोटे-बड़े आकारवाला गोत्रकर्म दो प्रकार १३ का होता है-मलिन और समुज्ज्वल, (उच्चगोत्र और नीचगोत्र) । अन्तराय कर्म चार और एक-पाँच प्रकार यदि वह दो प्रकार के तप में अपने को लौन करता है, तो यह अपवित्र मनुष्यत्व पवित्र होता है। पाँच का है जो करनेवाले को दान का निवारण करनेवाला होता है। Jain Education International For Private & Personal use only mom 115...
SR No.002738
Book TitleAdi Purana
Original Sutra AuthorPushpadant
Author
PublisherJain Vidyasansthan Rajasthan
Publication Year2004
Total Pages712
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari & Literature
File Size147 MB
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