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________________ ६२ महापुराणे उत्तरपुराणम् अभात् सुमनसा वृष्टिः पतन्ती नभसो विभुम् । तारावलिरिवायान्ती सेवित भक्तिनिर्भरा ॥२४॥ देवदुन्दुभयो बाद दध्वनुस्तजिंताब्धयः। दिशः श्रावयितु वास्य मोहारातिजयं विभोः ॥ २४ ॥ अभादस्य प्रभामध्ये प्रसन्न वक्त्रमण्डलम् । नाकनद्यामिवाम्भोजमिव वा बिम्बमैन्दवम् ॥ २४२॥ श्रीमद्वन्धकुटीमध्ये चतुर्भिसिगुणैर्गणैः। तारागणैः शरच्चन्द्र इव सेव्यो व्यराजत ॥ २४३॥ दचादित्रिनवत्युक्तगणेशः खत्रयद्विस- ।म्प्रोक्तपूर्वधरः शून्यत्रिकाष्ठावधिलोचनः ॥ २४॥ शून्यद्वयचतुःशून्य द्विकपक्षोक्तशिक्षकः । खचतुष्कैकनिदिष्टकेवलावगमाग्रणीः ॥ २४५ ॥ चतुर्दशसहस्सोक्तविक्रियादिविभूषितः । खत्रयाष्टचतुर्ज्ञानपरिषत्परिवारितः ॥ २४६॥ खद्वयवखिंवादीशः सर्वसाईद्विलक्षकः । खचतुष्काष्टवयुक्तवरुणायायिकानुतः ॥ २४७ ॥ त्रिलक्षश्रावकाभ्यर्थ्यः श्राविकापञ्चलक्षकः । असङ्ख्यदेवदेवीड्यस्तिर्यक्सङ्ग्यातसेवितः ॥ २४८॥ प्रादक्षिण्येन भव्येश परीत्यैते गणाः पृथक् । “स्वकोष्ठेष्ववतिष्ठन्ति विहिताअलिकुड्मलाः ॥२४९॥ तत्राकृत्रिमसम्भूतभक्तिभारानतः स्फुरन् । मुकुटाग्रमणिः स्तोत्रं द्वितीयेन्द्रोऽभ्यधादिदम् ॥ २५० ॥ रत्नत्रयेण येनाप्तं रत्नत्रयमनुत्तरम् । त्वं देह्यस्मभ्यमप्युः सरत्नत्रयसम्पदम् ॥ २५१॥ स्वार्थः सागरमेरूणां परार्थः कल्पभूरुहाम् । देव स्वार्थः परार्थश्च महिमा महतस्तव ॥ २५२ ॥ ददासि परमं सौख्यमित्यस्तु भवतः "स्तवः । नन्द नन्देति देवस्य साधितात्मार्थसम्पदः ॥ २५३ ॥ से ही मैं अशोक-शोकरहित हुआ हूँ अतः उनके प्रति अपने पत्रों और फूलोंके द्वारा अनुराग ही प्रकट कर रहा हो ।। २३६ ।। आकाशसे पड़ती हुई फूलोंकी वर्षा ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो भगवानकी सेवा करनेके लिए भक्तिसे भरी हुई ताराओंकी पंक्ति ही आ रही हो ॥२४०॥ समुद्रकी गर्जनाको जीतनेवाले देवोंके नगाड़े ठीक इस तरह शब्द कर रहे थे मानो वे दिशाओंको यह सुना रहे हों कि भगवान्ने मोहरूपी शत्रुको जीत लिया है ॥ २४१ ।। उनकी प्रभाके मध्यमें प्रसन्नतासे भरा हुआ मुख-मण्डल ऐसा सुशोभित होता था मानो आकाशगङ्गामें कमल हो खिल रहा हो अथवा चन्द्रमाका प्रतिविम्ब ही हो ॥ २४२ ॥ जिस प्रकार तारागणोंसे सेवित शरद-ऋतका चन्द्रमा सुशोभित होता है उसी प्रकार बारह सभाओंसे सेवित भगवान् गन्धकुटीके मध्यमें सुशोभित हो रहे थे॥ २४३ ॥ उनके दत्त आदि तेरानवें गणधर थे, दो हजार पूर्वधारी थे, आठ हजार अवधिज्ञानी थे. दो लाख चार सौ शिक्षक थे; दश हजार केवलज्ञानी थे। वे चौदह हजार विक्रिया-ऋद्धिके धारक मुनियोंसे विभूषित थे, आठ हजार मनःपयेय ज्ञानके धारक उनकी सेवा करते थे, तथा सात हजार छह सौ वादियोंके स्वामी थे। इस प्रकार सब मुनियोंकी संख्या अढ़ाई लाख थी। वरुणा आदि तीन लाख अस्सी हजार आर्यिकाएँ उनकी स्तुति करती थीं। तीन लाख श्रावक और पाँच लाख श्राविकाएँ उनकी पूजा करती थीं। वे असंख्यात देव-देवियोंसे स्तुत्य थे और संख्यात तिर्यजनकी सेवा करते थे ।। २४३-२४८ ॥ ये सब बारह सभाओंके जीव प्रदक्षिणा रूपसे भव्योंके स्वामी भगवान् चन्दप्रभको घेरे हुए थे, सब अपने-अपने कोठोंमें बैठे थे और सभी कमलके मुकुलके समान अपनेअपने हाथ जोड़े हुए थे ।। २४६ ।। उसी समय जो उत्पन्न हुई भक्तिके भारसे नम्र हो रहा है और जिसके मुकुटके अग्रभागमें लगे हुए मणि देदीप्यमान हो रहे हैं ऐसा दूसरा ऐशानेन्द्र इस प्रकार स्तुति करने लगा।॥ २५०।। वह कहने लगा कि हे भगवन् ! जिस रत्नत्रयसे आपने उत्कृष्ट रत्नत्रय प्राप्त किया है वही रनत्रयसम्पत्ति आप मुझे भी दीजिये ।।२५१ ।। हे देव ! समुद्र और सुमेरु पर्वतकी महिमा केवल अपने लिए हैं तथा कल्पवृक्षकी महिमा केवल परके लिए है परन्तु सबसे बड़े ऐसे आपकी महिमा अपने तथा दूसरे दोनोंके लिए है ।। २५२ ।। हे भगवन् ! आप परम सुखके देनेवाले हैं ऐसी आपकी स्तुति तो दूर ही रही, अपने आत्मतत्त्व रूपी संपदाको सिद्ध करनेवाले आप सदा समृद्धिमान हो २ द्वय क०, ख, ग, घ०। ३ सन्नतः ल०। ४ स्वकोष्ठेऽप्यवतिष्ठन्ते । द्वयं खः। ५ स्तवं ल०, ख०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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