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________________ महापुराणे उत्तरपुराणम् यस्य हस्तगतो 'जेतुं तं शक्रोऽपि न शक्नुयात् । इति मत्वा पितानेन किं ते केनापि युद्धवान् ॥२२॥ इत्यप्राक्षीस तां सापि न स्वप्नेऽपीत्यभाषत । तदा प्रीतिङ्करो हस्तगतमस्त्रं विधाय तत् ॥ २८३ ।। तं हन्तुं निर्भयो भीमं गोपुराभ्यन्तरे स्थितः । निगूढतनुराविष्कृतोन्नतिर्वसुनं दधत् ॥ २८४ ॥ तस्मिन्क्षणे समागत्य समन्ताद्वीक्ष्य भीमकः । स्वविद्यां प्रेषयामास दृष्ट्वा दुष्टं जहीति तम् ॥ २८५॥ सम्यग्दृष्टिरयं सप्तविधभीतिविदूरगः। चरमाङ्गो महाशूरो नाहं हन्तुमिमं क्षमा ॥ २८६ ॥ इति भीत्वा तदभ्यणे सञ्चरन्तीमितस्ततः। विलोक्य भीमको विद्यां शक्तिहीनां व्यसर्जयत् ॥ २८७ ॥ निस्साराभूजेत्युक्त्वा साप्यगच्छददृश्यताम् । स्वयमेवासिमुत्खाय भीमकस्तं जिघांसुकः ॥ २८८ ॥ सम्प्राप्तवान्कुमारोऽपि तर्जयातिभीषणम् । तद्घातं वश्चयित्वाहस्तं प्राणैः सोऽप्यमुच्यत ॥ २८९ ॥ ततो विश्वस्य दुष्टारिमायान्तमभिवीक्ष्य सा। कुमारं कन्यकाभ्येत्य न्यधास्त्वं भद्र साहसम् ॥ २९०॥ इत्यारोप्यासनं स्वर्णमयं राजगृहागणे । अभिषिष्य जलापूर्णैः कलशैः कलधौतकैः ॥ २९१ ॥ विन्यस्य मणिभाभासि मुकुट चारुमस्तके । यथास्थानमशेषाणि विशिष्टाभरणान्यपि ॥ २९२ ॥ विलासिनीकरोद्धयमानचामरशोभिनम् । भकरोनिरीक्ष्याह प्रीतिकरकुमारकः ॥ २९३ ॥ किमेतदिति सावोचदरम्यस्याः स्वामिनी पुरः । दत्वा राज्यं मदीयं ते 'पट्टबन्धपुरस्सरम् ॥ २९४ ॥ रत्नमालां गले कृत्वा त्वां प्रेम्णा समभीभवम् । इति तत्प्रोक्तमाकये कुमारः प्रत्यभाषत ॥ २९५ ॥ विना पित्रोरनुज्ञानाव स्वीक्रियसे मया। कोऽपि प्रागेव सङ्कल्पो विहितोऽयमिति स्फुटम् ॥ २९६ ।। योर्व तत्समायोगकालेऽभीष्ट भविष्यति । इति तद्वचनं कन्या प्रतिपद्य धनं महत् ॥ २९७ ॥ तलवारके द्वारा किसीके साथ युद्ध किया है ? इस प्रकार उस कन्यासे पूछा। कन्याने उत्तर दिया कि इस तलवारसे पिताने स्वप्रम भी युद्ध नहीं किया है। तदनन्तर प्रीतिङ्कर कुमारने वह तलवार अपने हाथमें ले ली ।। २८१-२८३ ॥ जो निर्भय है, जिसने अपना शरीर छिपा रक्खा है और जो देदीप्यमान दिव्य तलवारको धारण कर रहा है ऐसा प्रीतिङ्कर भीमकको मारनेके लिए गोपुरके भीतर छिप गया। उसी समय भीमक भी आ गया, उसने सब ओर देखकर तथा यह कहकर अपनी विद्याको भेजा कि गोपुरके भीतर छिपे ह न दुष्ट पुरुषको देखकर मार डालो ॥ २८४-२८५॥ विद्या प्रीतिङ्करके पास जाते ही डर गई, वह कहने लगी कि यह सम्यग्दृष्टि है, सात भयोंसे सदा दूर रहता है, चरमशरीरी है और महाशूरवीर है; मैं इसे मारनेके लिए समर्थ नहीं हूं। इस प्रकार भयभीत होकर वह उसके पास ही इधर-उधर फिरने लगी। यह देख, भीमक समझ गया कि यह विद्या शक्तिहीन है तब उसने 'तू सारहीन है अतः चली जा' यह कह कर उसे छोड़ दिया और वह भी अदृश्यताको प्राप्त हो गई। विद्याके चले जानेपर प्रीतिङ्करको मारनेकी इच्छासे भीमक स्वयं तलवार उठाकर उस पर झपटा। इधर प्रीतिङ्करने भी उसे बहुत भयंकर डाँट दिखाकर तथा उसके वारको बचाकर ऐसा प्रहार किया कि उसके प्राण छूट गये ॥२८६-२८४ ॥ तदनन्तर दष्ट शत्रको मारकर आते हुए कुमारको देखकर कन्या सामने आई और कहने लगी कि हे भद्र ! आपने बहुत बड़ा साहस किया है ।। २६०॥ इतना कहकर उसने राजभवनके आँगनमें सुवर्ण-सिंहासनपर उसे बैठाया और जलसे भरे हुए सुवर्णमय कलशोंसे उसका राज्याभिषेक किया ।। २६१ ।। मणियोंकी कान्तिसे देदीप्यमान मुकुट उसके सुन्दर मस्तक पर बाँधा; यथास्थान समस्त अच्छे-अच्छे आभूषण पहिनाये और विलासिनी स्त्रियोंके हाथोंसे ढोरे हुए चमरोंसे उसे सुशोभित किया। यह सब देख प्रीतिङ्कर कुमारने कहा कि यह क्या है ? इसके उत्तरमं कन्याने कहा कि 'मैं इस नगरकी स्वामिनी हूँ, अपना राज्यपट्ट बाँध कर अपने लिए देती हूँ और यह रनमाला आपके गलेमें डालकर प्रेमपूर्वक आपकी सहामणी हो रही हूँ। यह सुनकर कुमारने उत्तर दिया कि मैं माता-पिताकी आज्ञाके बिना तुम्हें स्वीकृत नहीं कर सकता क्योंकि मैंने पहलेसे ऐसा ही संकल्प कर रक्खा है। यदि तुम्हारा ऐसा आग्रह ही है तो माता-पितासे मिलनेके समय तेरा अभीष्ट सिद्ध हो जावेगा। कन्याने प्रीतिङ्करकी यह बात मान ली और बहुत-सा धन बाँधकर उस लम्बी रस्सीके द्वारा जहाजपर उतारनेके लिए १ जन्तुं ल०।२ वसुनन्दधृत् इत्यपि कचित् । ३ पट्टबन्धपुरस्सराम् क०, ग, घ०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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