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________________ ४६ महापुराणे उत्तरपुराणम् त्यज तन्मोहमिस्येनं भवदेवोऽप्यनुवरः । मतिं ज्येष्ठानुरोधेन व्यधादीक्षाविधौ च सः॥१२॥ नीत्वा स्वगुरुसामीप्यं भगदत्तो भवच्छिदे। दीक्षामग्राहयन्मौक्षी सतां 'सोदर्यमीहशम् ॥१३॥ स द्रव्यसंयमी भूत्वा 'विधीदशवत्सरान् । विहृत्य गुरुभिः सार्धमन्येचरसहायकः ॥ १६॥ वग्राम निजं गस्वा सुनतागगिनीमभि । समीक्ष्यास्मिन् किमस्त्यम्ब नागश्री म काचन ॥१५॥ इति सम्प्रभयामास सा तस्येजितवेदिनी । नाहं वेधि मुने सम्यगुदन्तं तनिबन्धनम् ॥ १६ ॥ इस्यौदासीन्यमापना गुणवत्यायिका प्रति । संयमे तं स्थिरीकर्तमाख्यानकमब्रवीत् ॥ १० ॥ वैश्यः सर्वसमृद्धाख्यस्तहासीतनयः शुचिः । दारुकाख्यः स्वमात्रास्मच्छ्रेष्व्युच्छिष्टाशितं स्वया ॥१६॥ भोक्तव्यमिति निर्बन्धागोजितः स जुगुप्सया । वान्तवान् कसपात्रेण तन्मात्राहितं पुनः ॥ १६९ ॥ बुभुक्षुर्मातरं भोक्तुं प्रार्थयामास दारुकः । तयापि कंसपात्रस्थं पुरस्तादुपढौकितम् ॥ १७॥ बुभुक्षापीडितोऽप्येष नाग्रहीद्वान्तमात्मना । सोऽपि चेतादृशः साधुः कथं स्यक्तमभीप्सति ॥ १७ ॥ अथाख्यानमिदकं शृणु रुवाशयं स्थिरम् । नरेशो नरपालाख्यः श्वानमेकं सकौतुकः ॥१२॥ मृष्टाशनेन सम्पोष्य स्वर्णाभरणभूषितम् । सदा वनविहृत्यादिगतौ कनककल्पिताम् ॥१७॥ आरोग्य शिबिकामेवं मन्दबुद्धिरपालयत् । कदाचिच्छिबिका रूढो गच्छन्कौलेयकाधमः ॥ १७४ ॥ विष्टामालोक्य बालस्य लिप्सुरापतति स्म ताम् । तदृष्वापाकरोपो लकुटीतारनेन तम् ॥ १७५ ॥ तद्वन्मुनिश्च सर्वेषां पूजनीयः पुरातनः । त्यक्ताभिवाञ्छया भूयः सम्प्रामोति पराभवम् ॥ १७६ ॥ है ? ॥१६१॥ इसलिए तू स्त्रीका मोह छोड़ दे। बड़े भाईके अनुरोधसे भवदेव चुप रह गया और उसने दीक्षा धारण करनेका विचार कर लिया ।। १६२॥ अन्तमें भगदत्तने अपने गुरुके पास ले जाकर उसे संसारका छेद करनेके लिए मोक्ष प्राप्त करानेवाली दीक्षा ग्रहण करवा दी सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनोंका भाईपना ऐसा ही होता है ॥ १६३ ।। उस मूर्खने द्रव्यसंयमी होकर बारह वर्ष तक गुरुओंके साथ विहार किया। एक दिन वह अकेला ही अपनी जन्मभूमि वृद्ध प्राममें आया और सुव्रता नामकी गणिनीके पास जाकर पूछने लगा कि हे माता ! इस नगरमें क्या कोई नागश्री नामकी खी रहती है ? ॥ १६४-१६५ ।। गणिनीने उसका अभिप्राय समझकर उत्तर दिया कि हे मुने! मैं उसका वृत्तान्त अच्छी तरह नहीं जानती हूँ। इस प्रकार उदासीनता दिखाकर गणिनीने उस द्रव्यलिङ्गी मुनिको संयममें स्थिर करनेके लिए गुणवती नामकी दूसरी आर्यिकासे निम्नलिखित कथा कहनी शुरू कर दी। १६६-१६७ ॥ वह कहने लगी कि एक सर्वसमृद्ध नामका वैश्य था। उसके शुद्ध हृदयवाला दारुक नामका दासी-पुत्र था। किसी एक दिन उसकी माताने उससे कहा कि त हमारे सेठका जूठा भोजन खाया कर । इस तरह कहकर उसने जबर्दस्ती उसे गूंठा भोजन खिला दिया। वह खा तो गया परन्तु ग्लानि आनेसे उसने वह सब भोजन वमन कर दिया। उसकी माताने वह सब यमन काँसेकी थालीमें ले लिया और जब उस दारुकको भूख लगी और उसने मातासे भोजन माँगा तब उसने काँसेके पात्र में रक्खा हुश्रा वही वमन उसके सामने रख दिया। दारुक यद्यपि भूखसे पीड़ित था तो भी उसने वह अपना वमन नहीं खाया। जब दासी-पुत्रने भी अपना वमन किया हुआ भोजन नहीं खाया तब मुनि छोड़े हुए पदार्थको किस तरह चाहते हैं ? ॥ १६८-१७१ ॥ 'अब मैं एक कथा और कहती हूँ तू चित्त स्थिर कर सुन' यह कहकर गणिनी दूसरी कथा कहने लगी। उसने कहा कि एक नरपाल नामका राजा था। कौतुकवश उसने एक कुत्ता पाल रक्खा था। वह मीठे-मीठे भोजनके द्वारा सदा उसका पालन करता था और सुवर्णके आभूषण पहिनाता था। जब वह वनविहार आदि कार्यों के लिए जाता था, तब वह मन्दबुद्धि उसे सोनेकी पालकीमें बैठाकर ले जाता था। एक दिन वह नीच कुत्ता, पालकीमें बैठा हुआ जा रहा था कि अकस्मात् उसकी दृषि किसी बालककी विष्ठापर पड़ी। दृष्टि पड़ते ही वह, उस विष्ठाको प्राप्त करनेकी इच्छासे उसपर कूद पड़ा। यह देख राजाने उसे डण्डेसे पीटकर भगा दिया ।।१७२-१७५। इसी प्रकार जो मुनि पहले १ भातृत्वम् । २ मूर्खः । ३ अर्थाख्यान-ल. । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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