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________________ पञ्चसप्ततितम पर्व ५१३ अद्य पारावतद्वन्द्वं वीक्ष्य जमान्तरस्मृतेः । १च्यमुझन् नियमेनैतद्वयक्त' सर्व ममाब्रवीत् ॥१५॥ 'इत्यतोऽलकसुन्दर्या वचः श्रत्वाकुलाकुली । सुता पतिसमन्वेषणेच्छया पितरौ तदा ॥४६६ ॥ तद्भवान्तरवृत्तान्तं पट्टके लिखितं स्फुटम् । रगत्तेजोभिधानस्य नटवर्गे पटीयसः॥ ४६७ ।। मदनादिलतायाश्च दानसम्मानपूर्वकम् । तत्कर्तव्यं समाख्याय यत्नेनाकुरुतां करे ॥ ४६८॥ पुष्पकाख्ये वने तौ च कृतपदृप्रसारणौ । स्वयं नटितुमारब्धौ नानाजनसमाकुलम् ॥ ४६९ ॥ पितास्यास्तद्वने रन्तुं गतस्तत्र मुनीश्वरम् । समाधिगुप्तमालोक्य परीत्य कृतवन्दनः ॥ ४७० ॥ धर्मसद्भावमाकर्ण्य पप्रच्छ तदनन्तरम् । पूण्य मत्पुत्रिकापूर्वभवमा क वर्तते ॥ ४६॥ कथ्यतामिति दिव्यावधीक्षणः सोऽप्यथावदत् । स हेमाभपुरे वैश्यतनयोऽद्याप्तयौवनः ॥ ४७२ ॥ इति श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं तदैव स महीपतिः। सनटः ससुहृत्सर्वपरिवारपरिष्कृतः ॥ ४७३ ॥ गत्वा तत्र मनोहारि नृत्तं चित्रमयोजयत् । नागरैः सह नन्दाढ्यो नृत्तमालोकितुं गतः ॥ ४७४ ॥ जन्मान्तरस्मृतेर्मूछा सहसा सावपद्यत । शीतक्रियाविशेषापनीतमूर्छ तदग्रजः ॥ ४७५ ॥ जीवन्धरोऽवदन्मूच्छकारणं कथयेति तम् । पट्टकालिखितं सर्वमभिधायाभ्यधादिदम् ॥ ४७६ ॥ सोऽप्यद्य तव सोदर्योऽजनिषीत्यग्रज प्रति । तुष्टासौ च विवाहार्थ प्रागारब्ध महामहम् ॥ ४७७ ॥ इदं प्रकृतमन्नान्यच्छूयतां समुपस्थितम् । किराताधीश्वरो नान्ना विश्रुतो हरिविक्रमः ॥ ४७८ ॥ सदायादभयात्वा कपित्थाख्यवनेऽकरोत् । दिशागिरौ पुरं तस्य वनादिगिरिसुन्दरी ॥ ४७९ ॥ प्रिया तुग्वनराजोऽस्याप्यजायत वनेशिनः। वटवृक्षायो मृत्युश्चित्रसेनः ससैन्धवः ॥ १८॥ प्यारी श्रीचन्द्रा नामकी पुत्री हुई ॥ ४६४॥ आज कबूतरोंका युगल देखकर पूर्वभवका स्मरण हो आनेसे ही यह मूछित हुई थी, यह सब बात इसने मुझे साफ-साफ बतलाई है ॥४६५।। इस प्रकार अलकसुन्दरीके वचन सुनकर माता-पिता अपनी पुत्रीके पतिकी तलाश करनेकी इच्छासे बहुत ही व्याकुल हुए ॥ ४६६ ।। उन्होंने अपनी पुत्रीके पूर्वभवका वृत्तान्त एक पटियेपर साफ-साफ लिखवाया और नटोंमें अत्यन्त चतुर रङ्गतेज नामका नट तथा उसकी स्त्री मदनलताको बुलाया, दान देकर उनका योग्य सन्मान किया, करने योग्य कार्य समझाया और 'यत्नसे यह कार्य करना' ऐसा कहकर वह चित्रपट उनके हाथमें दे दिया ॥४६७-४६८ ॥ वे नट और नटी भी चित्रपट लेकर पुष्पक वनमें गये और उसे वहीं फैलाकर सब लोगोंके सामने नृत्य करने लगे ॥४६६ ॥ इधर श्रीचन्द्राका पिता भी उसी वनमें क्रीड़ा करनेके लिए गया था वहाँ उसने समाधिगुप्त मुनिराजको देखकर प्रदक्षिणाएँ दी, नमस्कार किया, धर्मका स्वरूप सुना और तदनन्तर पूछा कि हे पूज्य ! मेरी पुत्रीका पूर्वभवका पति कहाँ है ? सो कहिये। मुनिराज अवधिज्ञानरूपी दिव्य नेत्रके धारक थे इसलिए कहने लगे कि वह आज हेमाभनगरमें है तथा पूर्ण यौवनको प्राप्त है ।। ४७०-४७२ । इस प्रकार मुनिराजके वचन सुनकर वह राजा नट, मित्र तथा समस्त परिवारके लोगोंके साथ हेमाभनगर पहुँचा और वहाँ पहुँचकर उसने मनको हरण करनेवाले एक आश्चर्यकारी नृत्यका आयोजन किया। उस नृत्यको देखनेके लिए नगरके अन्य लोगोंके साथ नन्दाढ्य भी गया था ॥४७३-४७४॥ परन्तु वह जन्मान्तरका स्मरण हो आनेसे सहसा मूच्छित होगया। तदनन्तर विशेष-विशेष शीतलोपचार करनेसे जब उसकी मूर्छा दूर हुई तब बड़े भाई जीवन्धर कुमारने उससे कहा कि मूर्छा आनेका कारण बतला। इसके उत्तरमें नन्दाढ्यने चित्रका सब हाल कहकर जीवन्धरसे कहा कि वही गुणमित्रका जीव आज मैं तेरा छोटा भाई हुआ हूँ। यह सुनकर जीवन्धर कुमार बहत ही सन्तुष्ट हए और विवाहके लिए पहलेसे ही महामह पूजा प्रारम्भ करने लगे ॥४७५-४७७॥ इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और कहता हूँ उसे भी सुनो। हरिविक्रम नामसे प्रसिद्ध एक भीलोंका राजा था। उसने भाई, बन्धुओंसे डरकर कपित्थ नामक वनमें दिशागिरि नामक पर्वतपर वनगिरि नामक नगर बसाया था। उस वनके स्वामी भीलके सुन्दरी नामकी स्त्री थी और वनराज नामका पुत्र था । वटवृक्ष, मृत्यु, चित्रसेन, १ विमुह्याद्ययमेवैतत् ल० । २ इत्यथालक-इति क्वचित । ६५ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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