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________________ पञ्चसप्ततितम पर्व सविर्ष वाशन मिन्न कृतनं वा सहिंसकम् । धर्म वाशर्मदं राज्यं तदैयः। सचिवाधमः ॥ २२३ ॥ अतो विजयदेवी च यन्त्रमारुह्य गारुडम् । शोकाग्निदह्यमानाङ्गी रुदन्ती यक्षिरक्षिता ॥ २२४ ॥ प्रणवक्त्रगलद्धारालोहिताक्रान्तशूलकैः। शूलनिर्भेदसम्भूतवेदनालुलितासुकैः ॥ २२५ ॥ कम्पमानरचोवक्त्रैः स्तेनैर्नानाविधै रवैः । सामिदग्धं शवं वढेराक्रष्याग्छिय खण्डशः ॥ २२६ ॥ कृत्तिकामिनिशाताभि किनीभिः समन्ततः । खादन्तीभिश्च सङ्कीर्ण पितृणामगमद् वनम् ॥ २२ ॥ तत्र रात्रौ कृतारक्षा यक्ष्या विगतबाधिका । अलब्ध तनयं कान्तं द्यौरिवामृतदीधितिम् ॥ २२८ ॥ नाभदस्यास्ततोऽल्पोऽपि पुत्रोत्पत्तिसमुत्सवः। शोकः प्रत्युत सम्भतो विलोमविधिवर्धितः ॥ २२९॥ सद्यो यक्षीच सुस्थाप्य समन्तान्मणिदीपिकाः। शोकाकुलां विलोक्यनां दावालीडलतोपमाम् ॥२३॥ सर्वस्थानानि दुःस्थानि गत्वर्यो यौवनश्रियः। विध्वंसी बन्धुसम्बन्धो जीवित दीपसञ्चलम् ॥ २३ ॥ कायः सर्वाशुचिप्रायो हेयोऽयमिह धीमताम् । राज्यं सर्वजगत्पूज्यं विद्यदुद्योतसन्निभम् ॥ २३२॥ पर्यायेष्वेव सर्वेषां प्रीतिः सर्वेषु वस्तुषु । तेऽवश्यं नश्वरास्तस्मात्प्रीतिः पर्यन्ततापिनी ॥ २३३ ॥ सत्यप्यर्थे रतिर्न स्यात् स्वयं वासति चेप्सिते । सति स्वस्मिन्नतो चासौ त्रयाणां वा स्थिते क्षतिः॥२३॥ यस्य निष्क्रममाक्रम्य' विश्वं विज्ञप्तिरीक्षते । नेक्षित स्थान तेनापि कापि किञ्चित्कदाचन ॥ २३५॥ । सत्सु भाविषु च प्रीतिरस्ति चेदस्तु वस्तुषु । वृथा प्रथयति प्रीतिं विनष्टेषु सुधीः स कः ॥ २३६ ॥ इति संसारसद्भावं विचिन्स्य विजये प्रिये । शुचं मा गा व्यतीतेषु कृथाः प्रीतिञ्च मा वृथा ॥ २३७ ॥ युद्ध में राजाको मारकर उसके राज्य पर आरूढ हो गया ।। २२१-२२२ ॥ उस नीच मन्त्रीने विष मिले हुए भोजनके समान, कृतघ्न मित्रके समान अथवा हिंसक धर्मके समान दुःख देने वाला वह राज्य प्राप्त किया था ।।२२३॥ इधर विजया महादेवी गरुड़ यन्त्रपर बैठकर चली। शोक रूपी अमिसे उसका सारा शरीर जल रहा था और वह रो रही थी परन्तु यक्षी उसकी रक्षा कर रही थी ।।२२४॥ इस प्रकार चलकर वह विजया रानी उस श्मशानभूमिमें जा पहुंची जहाँ घावोंके अग्रभागसे निकलती हुई खूनकी धाराओंसे शूल भीग रहे थे, शूल छिद जाने से उत्पन्न हुई वेदनासे जिनके प्राण निकल गये हैं तथा जिनके मुख नीचेकी ओर लटक गये हैं ऐसे चोर जहाँ नाना प्रकारके शब्द कर रहे थे। कहींपर डाकिनियाँ अधजले मुरदेको अग्निमेंसे खींचकर और तीक्ष्ण छरियोंसे खण्डखण्ड कर खा रही थीं। ऐसी ढाकिनियोंसे वह श्मशान सब ओरसे व्याप्त था ॥ २२५-२२७ ।। उस श्मशानमें यक्षी रातभर उसकी रक्षा करती रही जिससे उसे रश्वमात्र भी कोई बाधा नहीं हुई। जिस प्रकार आकाश चन्द्रमाको प्राप्त करता है उसी प्रकार उस रानीने उसी रात्रिमें एक सुन्दर पुत्र प्राप्त किया ॥२२८ ॥ उस समय विजया महारानीको पुत्र उत्पन्न होनेका थोड़ा भी उत्सव नहीं हुआ था किन्तु भाग्यकी प्रतिकूलतासे बढ़ा हुआ शोक ही उत्पन्न हुआ था। यक्षीने सब ओर शीघ्र ही मणिमय दीपक रख दिये और दावानलसे झुलसी हुई लत्ताके समान महारानीको शोकाकुल देखकर निम्न प्रकार उपदेश दिया। वह कहने लगी कि इस संसारमें सभी स्थान दुःखसे भरे हैं, यौवनकी लक्ष्मी नश्वर है, भाई-बन्धुओंका समागम नष्ट हो जाने वाला है, जीवन दीपकके समान चञ्चल है, यह शरीर समस्त अपवित्र पदाथासे भरा हुआ हैं अतः बुद्धिमान् पुरुषोंके द्वारा हेय हैछोड़ने योग्य है। जिसकी समस्त संसार पूजा करता है ऐसा यह राज्य बिजलीकी चमकके समान है। सब जीवोंकी समस्त वस्तुओंकी पर्यायोंमें ही प्रीति होती है परन्तु वे पर्याय अवश्य ही नष्ट हो जाती हैं इसलिए उनमें की हुई प्रीति अन्तमें सन्ताप करने वाली होती है । अनिष्ट पदार्थके रहते हुए भी उसमें प्रीति नहीं होती और इष्ट पदार्थके रहते हुए उस पर अपना अधिकार नहीं होता तथा अपने आपमें प्रीति होनेपर पदार्थ, इष्टपना एवं अधिकार इन तीनोंकी ही स्थितिका क्षय हो जाता है। जिनका ज्ञान बिना किसी क्रमके एक साथ समस्त पदार्थोंको देखता है उन्होंने भी नहीं देखा कि कहीं कोई पदार्थ स्थायी रहता है। यदि विद्यमान और होनहार वस्तुओंमें प्रेम होता है तो ., भले ही हो परन्तु जो नष्ट हुई वस्तुओंमें भी प्रेम करता है उसे बुद्धिमान् कैसे कहा जा सकता है? १ राज्यमाददे ल०। २-मासाद्य ख० । Jain Education Internatio For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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