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________________ पञ्चसप्ततितमं पर्व अथान्येद्यः समासीन गणेन्द्र विपुलाचले । श्रेणिकः प्रीणिताशेषभयं सुग्यकतेजसम् ॥१॥ गणिन्याश्चन्दनार्यायाः सम्बन्धमिह जन्मनः । अन्वयुङक गणी वैवमाहाहितमहरिंकः ॥२॥ . सिन्ध्वाख्यविषये भूभृवैशाली नगरेऽभवत् । चेटकाख्योऽतिविण्यातो विनीतः परमाहंतः॥३॥ तस्य देवी सुभद्राख्या तयोः पुत्रा दशाभवन् । धनाख्यौ दराभवाम्तावुपेन्द्रोऽन्यः सुदरावा ॥४॥ सिंहभद्रः सुकम्भोजोऽकम्पनः सपतङ्गकः । प्रभानः प्रभास धर्मा इव सुनिर्मकाः ॥ ५ ॥ सप्तधयो वा पुण्यश्च उयायसी प्रियकारिणी। ततो मृगावती पचासुप्रभा प्रभावती ॥ ॥ चेलिनी पञ्चमी ज्येष्ठा षष्ठी चान्स्या चचन्दना । विदेहविषये कुण्डसम्झायो पुरि भूपतिः ॥७॥ नायो नाथकुलस्यैकः सिद्धार्थास्यसिसिदिभाक' । तस्य पुण्यानुभावेन 'प्रियासीस्प्रियकारिणी ॥ ८॥ विषये बत्सवासाख्ये कौशाम्बीनगराधिपः । सोमवंशे शतानीको देव्यस्यासीन्मृगावती ॥९॥ दशार्णविषये राजा हेमकच्छपुराधिपः । सूर्यवंशाम्बरे राजसमो दशरथोऽभवत् ॥१०॥ तस्याभूत्सुप्रभा देवी भास्वतो वा प्रभामला । कच्छाख्यविषये रोरुकाख्यायां पुरि भूपतिः ॥1॥ महानुदयनस्तस्य प्रेमदाऽभूत्प्रभावती। प्राप शीलवतीख्यातिं सा सम्यक्छीलधारणात् ॥१२॥ गान्धारविषये ख्यातो महीपालो महीपुरे। याचित्वा सत्यको ज्येष्ठामलटभ्वा वयान् विधीः ॥ १३॥ युवा रगाङ्गणे प्राप्तमानभाः स सत्रपः। सद्यो दमवर प्राप्य ततः संयममग्रहीत् ॥१५॥ अथानन्तर--किसी दूसरे दिन समस्त भव्य जीवोंको प्रसन्न करनेवाले और प्रकट तेजके धारक गौतम गणधर विपुलाचंलपर विराजमान थे। उनके समीप जाकर राजा श्रेणिकने समस्त आर्यिकाओंकी स्वामिनी चन्दना नामकी आर्यिकाकी इस जन्मसम्बन्धी कथा पूछी सो अनेक बड़ी बड़ी ऋद्धियोंको धारण करने वाले गणधर देव इस प्रकार कहने लगे ॥ १-२॥ सिन्धु नामक देशकी वैशाली नगरीमें चेटक नामका अतिशय प्रसिद्ध, विनीत और जिनेन्द्र देषका अतिशय भक्त राजा. था। उसकी रानीका नाम सुभद्रा था। उन दोनोंके दश पुत्र हुए जो कि धनदत्त, धनभद्र, उपेन्द्र, सुदत्त, सिंहभद्र, मुकुम्भोज, अकम्पन, पतङ्गक, प्रभञ्जन और प्रभास नामसे प्रसिद्ध थे तथा उत्तम क्षमा आदि दश धर्मों के समान जान पड़ते थे॥३-५॥ इन पुत्रोंके सिवाय सात ऋद्धियों के समान सात पुत्रियां भी थीं। जिनमें सबसे बड़ी प्रियकारिणी थी, उससे छोटी मुगावती, उससे छोटी, सुप्रभा, उसस्ते छोटी प्रभावती, उससे छोटी चेलिनी, उससे छोटी ज्येष्ठा और सबसे छोटी चन्दना थी। विदेह देशके कुण्डनगरमें नाथ वंशके शिरोमणि एवं तीनों सिद्धियोंसे सम्पन्न राजा सिद्धार्थ राज्य करते थे। पुण्यके प्रभाव से प्रियकारिणी उन्हीं की स्त्री हुई थी॥ ६-८।। वत्सदेशकी कौशाभ्बीजगरीमें चन्द्रवंशी राजा शतानीक रहते थे। मृगावती नामकी दूसरी पुत्री उनकी स्त्री हुई थी ॥६॥ दशार्ण देशके हेमकच्छ नामक नगरके स्वामी राजा दशरथ थे जो कि सूर्यवंश रूपी धाकाशके चन्द्रमाके समान जान पड़ते थे। सूर्यकी निर्मलप्रभाके समान सुनना नामकी तीसरी पुत्री उनकी रानी हुई थी, कच्छदेशकी रारुका नामक नगरीम उदयन नामका एक बड़ा र प्रभावती नामकी चौथी पुत्री उसीकी हृदयवल्लभा हुई थी। अच्छी तरह शीलवत धारण करनेसे इसका दूसरा नाम शीलवती भी प्रसिद्ध हो गया था ॥ १०-१२ ।। गान्धार देशके महीपुर नगरमें राजा सत्यक रहता था। उसने राजा चेटकसे उसकी ज्येष्ठा नामकी पुत्रीकी याचना की परन्तु राजाने नहीं दी इससे उप्स दुर्बुद्धि मूर्खने सुपित होकर रणाङ्गणमें युद्ध किया परन्तु युद्धमें वह हार गया जिसप्ते मानभङ्ग होनेसे लज्जित होनेके कारण उसने शीघ्र ही दमवर नामक मुनिराजके समीप जाकर १ सुप्रभातः ल., कचिदन्यापि च । २ स्वसिदिभाक्ल.।। प्रियाभूत क.। ४ प्रमदा न०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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