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________________ चतुःसप्ततितम पर्व प्रकृष्टदिव्यभोगानां भोक्तेति वननायकः । तत्वार्थ तद्वचो ध्यायमहो माहात्म्यमीहशम् ॥ ४१४॥ प्रतस्याभीप्सितं सौख्यं प्रापयेदिति भावयन् । समाधिगुप्तमभ्येत्य श्रावकव्रतमग्रहीत् ॥ ४१५॥ भध्योऽयमिति तं मत्वा यक्षी तत्पक्षपाततः। उपायेनानयज्जैन धर्म सा हि हितैषिता ॥४१६॥ स्वर्गात्खदिरसारोऽपि द्विसागरमितायुषा । दिव्यं भोगोपभोगान्ते निदानात्प्रच्युतस्ततः ॥ ४१७ ॥ सूनुः कुणिकभूपस्य श्रीमत्यां त्वमभूरसौ । अथान्यदा पिता तेऽसौ मत्पुत्रेषु भवेत्पतिः ॥ ४१८॥ राज्यस्य कतमोऽत्रेति निमित्तः सकलैरपि । सम्यकपरीक्ष्य सन्तुष्टो निसर्गात्स्नेहितस्त्वयि ॥ ४१९ ॥ राज्यस्याहोऽयमेवेति निश्चित्यापायशङ्कया। दायादेभ्यः परित्रातुं त्वां सुधीः कृत्रिमधा ॥ ४२०॥ निराकरो पुरात्तस्माद्देशान्तरमभीयुषः । २अप्रकाशनृपादेशभयाशाः सकलाः प्रजाः ॥ ४२१॥ नन्दिग्रामनिवासिन्यः प्रत्युत्थानपुरस्सरम् । स्नानभोजनशय्यादिक्रियावैमुख्यमागमन् ॥ ४२२ ॥ ततस्त्वमपि केनापि ब्राह्मणेन समं व्रजन् । देवताजातिपाषण्डिमोहप्रतिविधायिनीः ॥ ४२३ ॥ कथाः प्ररूपयन्प्रीत्या तदीयस्थानमापिवान् । स्वद्वाग्मित्वयुवत्वादिगुणरक्तमतिद्विजः ॥ ४२४ ॥ वितीर्णवान् सुतां तुभ्यं निजामापूर्णयौवनाम् । तत्पाणिग्रहणं कृत्वा चिरं ४तत्रावसः "सुखम् ॥४२५॥ कदाचिकेनचिद्धतुनायं राज्यं परित्यजन् । भवन्तं ब्राह्मणग्रामादानीय कुणिकक्षितीट ॥ ४२६ ॥ स्वं राज्यं दशवांस्तुभ्यं त्वञ्च तत्प्रतिपालयन् । अनभिव्यक्तकोपः सन् पूर्वावज्ञानसंस्मृतेः ॥ ४२७॥ विधित्सुनिग्रहं सूञ नन्दिग्रामनिवासिनाम् । आदिष्टवान् करं तेषां निवर्वोढुमतिदुष्करम् ॥ ४२८ ॥ सम्पन्न हो गया था अतः व्यन्तर योनिसे पराङ्मुख होकर सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ है यह मेरा पति कैसे हो सकता था ॥ ४१०-४१३ ॥ यह तो स्वर्गके श्रेष्ठ भोगोंका भोक्ता हुआ है। इस प्रकार धनका स्वामी शूरवीर, यक्षीके यथार्थ वचनोंपर विचार करता हुआ कहने लगा कि अहो ! व्रतका ऐसा माहात्म्य है ? अवश्य ही वह इच्छित सुख को प्राप्त कराता है। ऐसा विचारकर उसनेसमाधिगुप्त मुनिराजके समीप जाकर श्रावकके व्रत धारण कर लिये ॥४१४-४१५ । इस प्रकार उस यक्षीने उसे भव्य समझकर उसके पक्षपातसे इस उपायके द्वारा उसे जैनधर्म धारण कराया सो ठीक ही है क्योंकि हितैषिता-पर हितकी चाह रखना, यही है ।। ४१६ ।। उधर खदिरसारका जीव भी दो सागर तक दिव्य भोगोंका उपभोगकर स्वर्गसेच्युत हुश्रा और यहाँ राजा कुणिककी श्रीमती रानीसे तू श्रेणिक नामका पुत्र हुआ है । अथानन्तर किसी दिन तेरे पिताने यह जानना चाहा कि मेरे इन पुत्रों में राज्यका स्वामी कौन होगा ? उसने निमित्तज्ञानियोंके द्वारा बताये हुए समस्त निमित्तोंसे तेरी अच्छी तरह परीक्षा की और वह इस बातका निश्चय कर बहुत ही संतुष्ट हुआ कि राज्यका ही है। तुझपर वह स्वभावसे ही स्नेह करता था अतः राज्यका अधिकारी घोषित होनेके कारण तुझपर कोई संकट न आ पड़े इस भयसे दायादोंसे तेरी रक्षा करनेके लिए उस बुद्धिमान्ने तुझे बनावटी क्रोधसे उस नगरसे निकाल दिया। तू दूसरे देशको जानेकी इच्छासे नन्दिग्राममें पहुँचा। राजाकी प्रकट आज्ञाके भयसे नन्दिग्राममें रहने वाली समस्त प्रजा तुझे देखकर न उठी और न उसने स्नान, भोजन, शयन आदि कार्योंकी व्यवस्था ही की, वह इन सबसे विमुख रही ॥ ४१७-४२२।। तदनन्तर तु भी किसी ब्राह्मणके साथ आगे चला और देवमूढ़ता, जातिमूढ़ता तथा पाषण्डिमूढताका खण्डन करने वाली कथाओंको कहता हुआ बड़े प्रेमसे उसके स्थानपर पहुँचा। तेरे वचनकौशल और यौवन आदि गुणोंसे अनुरञ्जित हो कर उस ब्राह्मणने तेरे लिए अपनी यौवनवती पुत्री दे दी और तू उसके साथ विवाहकर वहाँ चिरकाल तक सुखसे रहने लगा॥४२३-४२५ ।। किसी एक समय किसी कारणवश राजा कुणिकने अपने राज्यका परित्याग करना चाहा तब उन्होंने उस ब्राह्मणके गाँवसे तुझे बुलाकर अपना सब राज्य तुझे दे दिया और तू भी राज्यका पालन करने लगा। यद्यपि तूने अपना क्रोध बाह्यमें प्रकट नहीं होने दिया था तो भी पहले किये हुए अनादर १ ते स ल । २ सुप्रकाशनूपादेशभयान्न सकलाः ल । ३ पाखण्ड-ल. । ४ तत्रावसत्सुखी ल०। ५ सुखी म०, ल०। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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