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________________ चतुःसप्ततितमं पर्व 'प्रत्ययस्तस्फलचैतत्सर्वमेव प्रपञ्चतः । प्रमाणनयनिक्षेपायुपायैः सुनिरूपितम् ॥ ३८२ ॥ * औत्पत्तिक्यादिधीयुक्ताः श्रुतवन्तः सभासदाः । केचित्संयमापन्नाः संयमासंयमं परे ॥ ३८३ ॥ सम्यक्त्वमपरे सथः स्वभव्यत्वविशेषतः । एवं श्रीवर्धमानेशां विदधद्धर्मदेशनाम् ॥ ३८४ ॥ क्रमाद्वाजगृहं प्राप्य तस्थिवान् विपुलाचले । श्रुत्वैतदागमं सद्यो मगधेशत्वमागतः ॥ ३८५ ॥ इति सर्व समाकर्ण्य प्रतुष्टः प्रणतो मुहुः । जातसंवेगनिर्वेदः स्वपूर्वभवसन्ततिम् ॥ ३८६ ॥ अन्वयुङ क गणाधीशं सोऽपीति प्रत्यबूबुधत् । त्रिषष्टिलक्षणं पूर्वं पुराणं पृष्टमादितः ॥ ३८७ ॥ निर्दिष्टञ्च मया स्पष्टं श्रुतञ्च भवता स्फुटम् । श्रणु चित्तं समाधाय श्रेणिक श्रावकोत्तम ॥ ३८८ ॥ वृत्तकं तव वक्ष्यामो भवन्त्रयनिबन्धनम् । इह जम्बूमति द्वीपे विन्ध्यादौ " कुटजाइये ॥ ३८९ ॥ वने खदिरसाराख्यः किरातः सोऽन्यदा मुनिम् । समाधिगुप्तनामानं समीक्ष्य व्यनमन्मुदा ॥ ३९० ॥ धर्मलाभोऽस्तु तेऽथेति चाकृताशासनं मुनिः । स धर्मो नाम किंरूपस्तेन किं कृत्यमङ्गिनाम् ॥ ३९१ ॥ किरातेनेति सम्पृष्टः सोऽपीति प्रत्यभाषत । निवृतिर्मधुमांसादिसेवायाः पापहेतुतः ॥ ३९२ ॥ स धर्मस्तस्य लाभो यो धर्मलाभः स उच्यते । तेन कृत्यं परं पुण्यं पुण्यारस्वर्गे सुखं परम् ॥ ३९३ ॥ श्रुत्वा तमाहमस्य स्यामित्युवाच वनेचरः । तदाकूतं वितर्क्याह मुनिः किं काकमांसकम् ॥ ३९४॥ भव्य भक्षितपूर्व ते न वेति सुधियां वरः । तच्छ्रुत्वा स विचिन्त्याख्यशत्कदापि न भक्षितम् ॥ ३९५ ॥ मयेत्येवं यदि त्याज्यं तरवयेत्यब्रवीन्मुनिः । सोऽपि तद्वाक्यमाकर्ण्य प्रतुष्टो दीयतां व्रतम् ॥ ३९६ ॥ ' तदित्यादाय वन्दित्वा गतस्तस्य कदाचन । व्याधाव साध्ये सम्भूते काकमांसस्य भक्षणात् ॥ ३९७ ॥ कारण तथा उनके फलका प्रमाण नय और निक्षेप आदि उपायोंके द्वारा विस्तारपूर्वक निरूपण किया । भगवान्का उपदेश सुनकर स्वाभाविक बुद्धिवाले कितने ही शास्त्रज्ञ सभासदोंने संयम धारण किया, कितनों ही ने संयमासंयम धारण किया, और कितनोंने अपने भव्यत्व गुणकी विशेबतासे शीघ्र ही सम्यग्दर्शन धारण किया । इस प्रकार श्रीवर्धमान स्वामी धर्मदेशना करते हुए अनुक्रमसे राजगृह नगर आये और वहाँ विपुलाचल नामक पर्वतपर स्थित हो गये । हे मगधेश ! जब तुमने भगवान् के आगमनका समाचार सुना तब तुम शीघ्र ही यहाँ आये || ३७६-३८५ ॥ यह सब सुनकर राजा श्रेणिक बहुत ही संतुष्ट हुआ, उसने बार-बार उन्हें प्रणाम किया, तथा संवेग और निर्वेदसे युक्त होकर अपने पूर्वभव पूछे । उसके उत्तर में गणधर स्वामी भी समझाने लगे कि तूने पहले तिरसठशलाका पुरुषोंका पुराण पूछा था सो मैंने स्पष्ट रूपसे तुझे कहा है और तूने उसे स्पष्ट. रूपसे सुना भी है । हे श्रावकोत्तम श्रेणिक ! अब मैं तेरे तीन भवका चरित कहता हूँ सो तू चित्तको स्थिरकर सुन। इसी जम्बूद्वीपके विन्ध्याचल पर्वतपर एक कुटज नामक वन है उसमें किसी समय खदिरसार नामका भील रहता था। एक दिन उसने समाधिगुप्त नामके मुनिराजके दर्शनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता नमस्कार किया ।। ३८६-३६० ॥ इसके उत्तर में मुनिराजने 'आज तुझे धर्म लाभ हो' ऐसा आशीर्वाद दिया । तब उस भीलने पूछा कि हे प्रभो ! धर्म क्या है ? और उससे लाभ क्या है ? भील के ऐसा पूछने पर मुनिराज कहने लगे कि मधु, मांस आदिका सेवन करना पापका कारण है अतः उससे विरक्त होना धर्म कहलाता है । उस धर्मकी प्राप्ति होना धर्मलाभ कहलाता है । उस धर्मसे पुण्य होता है और पुण्यसे स्वर्ग में परम सुखकी प्राप्ति होती है ।। ३६१ - ३६३ ।। यह सुनकर भील कहने लगा कि मैं ऐसे धर्मका अधिकारी नहीं हो सकता । मुनिराज उसका अभिप्राय समझ कर कहने लगे कि, हे भव्य ! क्या तूने कभी पहले कौआका मांस खाया है ? बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ भील, मुनिराजके वचन सुनकर और विचारकर कहने लगा कि मैंने वह तो कभी नहीं खाया है। इसके उत्तर में मुनिराजने कहा कि यदि ऐसा है तो उसे छोड़ देना चाहिये । मुनिराजके वचन सुनकर उसने बहुत ही संतुष्ट होकर कहा कि हे प्रभो ! यह व्रत मुझे दिया जाय ।। ३६४-३६६ ।। तदनन्तर ४६६. १ प्रत्येयः ल० । २ उत्पत्तिकादि ल० । ३ श्रात्र कोचमः ल० । ४ कुटचाइये ल० । ५ किरातः कीदृशो धर्मस् ल० । ६ तदा कुल-ल० । Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.002728
Book TitleUttara Purana
Original Sutra AuthorGunbhadrasuri
AuthorPannalal Jain
PublisherBharatiya Gyanpith
Publication Year2000
Total Pages738
LanguageHindi, Sanskrit
ClassificationBook_Devnagari & Mythology
File Size20 MB
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